स्टेट डेस्क, मुस्कान कुमारी |
पिता का सपना, चार बार UPSC में नाकामी और एक जमीन विवाद ने खोली पोल....
रांची | सात वर्षों तक सत्ता, रौब और रसूख की फर्जी दुनिया में जी रहा एक युवक तब बेनकाब हुआ, जब वह जमीन विवाद के सिलसिले में थाने पहुंचा। खुद को आईएएस अधिकारी बताने वाला यह शख्स दरअसल चार बार यूपीएससी परीक्षा में असफल एक अभ्यर्थी निकला, जिसने पिता की इच्छा और सामाजिक दबाव के चलते झूठ की पूरी पहचान गढ़ ली थी।
थाने में रौब दिखाना पड़ा भारी
मामला तब सामने आया जब आरोपी राजेश एक भूमि विवाद में हस्तक्षेप के लिए थाने पहुंचा। उसने खुद को वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी बताते हुए पुलिसकर्मियों पर दबाव बनाने की कोशिश की। उसकी बातचीत के लहजे, हाव-भाव और खुद को पेश करने के तरीके ने स्थानीय थाना प्रभारी को सतर्क कर दिया। जब उससे आधिकारिक पहचान पत्र और पोस्टिंग से जुड़े दस्तावेज मांगे गए, तो वह संतोषजनक जवाब नहीं दे सका।
कड़ाई से पूछताछ के दौरान राजेश टूट गया और उसने स्वीकार किया कि वह कोई आईएएस अधिकारी नहीं है। इसके साथ ही सात साल से चली आ रही फर्जी पहचान की परतें एक-एक कर खुलती चली गईं।
चार बार UPSC, हर बार असफलता
पूछताछ में आरोपी ने बताया कि वह सिविल सेवा परीक्षा का अभ्यर्थी रहा है और उसने चार बार यूपीएससी की परीक्षा दी थी। हर असफल प्रयास के बाद परिवार और समाज की उम्मीदों का बोझ उस पर और बढ़ता गया। पिता की यह तीव्र इच्छा थी कि बेटा एक दिन बड़ा प्रशासनिक अधिकारी बने।
असफलता को स्वीकार करने के बजाय उसने झूठ का सहारा लिया और खुद को अधिकारी घोषित कर दिया। शुरुआत परिवार तक सीमित थी, लेकिन धीरे-धीरे यही झूठ उसकी पूरी पहचान बन गया।
फर्जी पहचान से बनी रसूख की दुनिया
पुलिस जांच में सामने आया है कि राजेश बीते सात वर्षों से राज्य के अलग-अलग इलाकों में खुद को ग्रुप-ए स्तर का वरिष्ठ अधिकारी बताकर घूमता रहा। वह सरकारी कार्यक्रमों, सामाजिक आयोजनों और प्रभावशाली लोगों के बीच अपनी पहचान एक प्रशासनिक अधिकारी के रूप में बनाता रहा।
हैरानी की बात यह है कि इतने लंबे समय तक किसी स्तर पर उसकी औपचारिक सत्यापन प्रक्रिया नहीं हुई, जिससे वह बेखौफ अपनी फर्जी पहचान को बनाए रखने में सफल रहा।
सुरक्षा और सत्यापन पर सवाल
इस पूरे मामले ने प्रशासनिक सुरक्षा व्यवस्था और पहचान सत्यापन प्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। असली अधिकारियों की मौजूदगी के बीच एक फर्जी व्यक्ति का वर्षों तक सक्रिय रहना न सिर्फ चौंकाने वाला है, बल्कि सिस्टम की खामियों की ओर भी इशारा करता है।
पुलिस अब इस बात की जांच कर रही है कि क्या आरोपी ने अपनी फर्जी पहचान का इस्तेमाल किसी अवैध लाभ, दबाव, वसूली या अन्य गैरकानूनी गतिविधियों के लिए किया।
मानसिक दबाव और सामाजिक भय की कहानी
जांच अधिकारियों के मुताबिक, यह मामला केवल जालसाजी तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके पीछे मानसिक दबाव, सामाजिक अपेक्षाएं और असफलता को छिपाने की प्रवृत्ति भी जुड़ी हुई है। राजेश ने स्वीकार किया कि एक बार झूठ बोलने के बाद वह उससे बाहर निकलने की हिम्मत नहीं जुटा सका।
समय के साथ झूठ इतना गहरा हो गया कि उसे खुद भी अपनी असली पहचान स्वीकार करने में डर लगने लगा।







