Ad Image
Ad Image

The argument in favor of using filler text goes something like this: If you use any real content in the Consulting Process anytime you reach.

  • img
  • img
  • img
  • img
  • img
  • img

Get In Touch

अरावली संरक्षण पर बड़ा फैसला: नई माइनिंग लीज पर पूर्ण प्रतिबंध

नेशनल डेस्क, श्रेया पांडेय |

नई दिल्ली: प्राचीन अरावली पर्वत श्रृंखला के अस्तित्व पर मंडराते संकट को देखते हुए केंद्र सरकार ने एक ऐतिहासिक कदम उठाया है। केंद्रीय पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय ने अरावली क्षेत्र में नए खनन पट्टों (Mining Leases) के आवंटन पर पूरी तरह से रोक लगा दी है। यह प्रतिबंध दिल्ली से लेकर हरियाणा, राजस्थान और गुजरात तक फैली पूरी अरावली पर्वतमाला पर समान रूप से लागू होगा। सरकार का यह निर्णय हाल ही में अरावली की परिभाषा को लेकर हुए विवाद और सर्वोच्च न्यायालय के कड़े रुख के बाद आया है।

अरावली पर्वतमाला दुनिया की सबसे पुरानी पर्वत श्रृंखलाओं में से एक है, जो थार मरुस्थल के विस्तार को रोकने, भूजल को रिचार्ज करने और उत्तर भारत की जैव विविधता को बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। पिछले कुछ दशकों में अवैध और अनियंत्रित खनन के कारण अरावली की कई पहाड़ियाँ पूरी तरह गायब हो गई थीं। मंत्रालय ने अपने आदेश में स्पष्ट किया है कि इस रोक का प्राथमिक उद्देश्य अरावली की पारिस्थितिक अखंडता (Ecological Integrity) को बनाए रखना और इसे एक अटूट भूवैज्ञानिक श्रृंखला के रूप में सुरक्षित करना है।

मुख्य बिंदु और दिशा-निर्देश

  • नए पट्टों पर रोक: अब से किसी भी राज्य सरकार को अरावली क्षेत्र में नए खनन लाइसेंस जारी करने की अनुमति नहीं होगी। यह रोक तब तक जारी रहेगी जब तक एक वैज्ञानिक 'सतत खनन प्रबंधन योजना' (MPSM) तैयार नहीं हो जाती।
  • मौजूदा खदानों पर सख्ती: जो खदानें पहले से चल रही हैं, उन्हें बंद नहीं किया गया है, लेकिन उन पर निगरानी बढ़ा दी गई है। राज्यों को निर्देश दिया गया है कि वे सर्वोच्च न्यायालय के आदेशों और पर्यावरणीय सुरक्षा मानकों का कड़ाई से पालन सुनिश्चित करें।
  • संरक्षित क्षेत्र का विस्तार: भारतीय वानिकी अनुसंधान एवं शिक्षा परिषद (ICFRE) को पूरे अरावली क्षेत्र का वैज्ञानिक सर्वेक्षण करने का काम सौंपा गया है। परिषद उन अतिरिक्त क्षेत्रों की पहचान करेगी जहाँ खनन को भविष्य में भी पूरी तरह प्रतिबंधित किया जाना चाहिए।
  • वैज्ञानिक परिभाषा का आधार: यह निर्णय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा स्वीकार की गई उस परिभाषा के बाद लिया गया है, जिसमें 100 मीटर से अधिक ऊंचाई वाली संरचनाओं को अरावली पहाड़ी माना गया है।

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि अरावली को नहीं बचाया गया, तो दिल्ली-एनसीआर समेत आसपास के क्षेत्रों में धूल भरी आंधी और मरुस्थलीकरण (Desertification) का खतरा बढ़ जाएगा। केंद्र सरकार ने अपनी प्रतिबद्धता दोहराते हुए कहा है कि 'ग्रीन वॉल प्रोजेक्ट' और खनन पर रोक जैसे कदमों से अरावली के ईकोसिस्टम को पुनर्जीवित किया जाएगा। सरकार का लक्ष्य 2030 तक बड़े पैमाने पर बंजर भूमि को फिर से हरा-भरा करना है।

अरावली पर लिया गया यह निर्णय न केवल पर्यावरण प्रेमियों के लिए एक बड़ी जीत है, बल्कि यह विकास और पारिस्थितिकी के बीच संतुलन बनाने की दिशा में एक निर्णायक मोड़ साबित हो सकता है।