लोकल डेस्क, एन के सिंह।
बदली व्यवस्था: अब दफ्तर नहीं, थानों के आंगन में लग रही 'जनता की अदालत'
नीरज कुमार,मोतिहारी कड़ाके की ठंड, ठिठुरती रातें और मन में न्याय की आस... अक्सर एक आम आदमी पुलिस की चौखट तक पहुंचते-पहुंचते अपनी उम्मीदें खोने लगता है। लेकिन पूर्वी चंपारण में अब तस्वीर बदल चुकी है। पुलिस अधीक्षक स्वर्ण प्रभात की एक अनूठी पहल ने न केवल पुलिस और जनता के बीच की दूरियों को पाट दिया है, बल्कि 'खाकी' के प्रति आमजन के विश्वास को एक नया जीवन दिया है।
थानों के आंगन में गूंज रही न्याय की आवाज
आमतौर पर बड़े साहब के दफ्तर के बाहर घंटों इंतजार करने वाले फरियादियों के लिए अब 'साहब' खुद उनके इलाके के थाने पहुंच रहे हैं। एसपी स्वर्ण प्रभात ने जनसुनवाई की व्यवस्था को विकेंद्रीकृत करते हुए इसे जिले के सभी थाना परिसरों तक पहुंचा दिया है। इसी क्रम में छतौनी थाना परिसर में आयोजित 'जनता दरबार' महज एक सरकारी औपचारिकता नहीं, बल्कि त्वरित न्याय का एक जीवंत मंच बन गया।
"थाना सुधरेगा, तभी जिला बदलेगा"
जनता दरबार के दौरान एसपी ने पुलिस महकमे को स्पष्ट संदेश दिया। उन्होंने कहा: "यदि पुलिस अधिकारी निष्पक्षता और संवेदनशीलता के साथ लोगों की बात सुनें, तो 80% समस्याओं का समाधान थाने की दहलीज पर ही संभव है।" मौके पर मौजूद सदर-1 पुलिस पदाधिकारी, अंचल निरीक्षक और थानाध्यक्षों को उन्होंने सख्त निर्देश दिए कि मामलों को लटकाने के बजाय उन्हें विधि-सम्मत तरीके से त्वरित गति से निष्पादित करें।
भावुक पल: जब 'रक्षक' ने ओढ़ाया सेवा का कंबल
छतौनी थाने में जनसुनवाई के दौरान एक बेहद मार्मिक दृश्य देखने को मिला। एसपी स्वर्ण प्रभात ने केवल फाइलें ही नहीं देखीं, बल्कि कड़ाके की ठंड में कांपते बुजुर्गों और असहायों के दर्द को भी महसूस किया। उन्होंने आगे बढ़कर वहां आईं बुजुर्ग महिलाओं और जरूरतमंदों के कंधों पर कंबल ओढ़ाए। न्याय के साथ मिली इस राहत को पाकर एक बुजुर्ग महिला की आंखों से निकले आंसू यह बताने के लिए काफी थे कि जब कानून का रखवाला संवेदनशीलता दिखाता है, तो व्यवस्था पर भरोसा अपने आप बढ़ जाता है।
साझा प्रयास से मजबूत होगी कानून-व्यवस्था
जनता दरबार के साथ-साथ एसपी ने पुलिस अधिकारियों के साथ एक संयुक्त बैठक भी की। इसमें मुफ्फसिल और छतौनी थाना क्षेत्र की कानून व्यवस्था को लेकर विशेष कार्ययोजना तैयार की गई। एसपी ने दो टूक शब्दों में कहा कि पुलिस की असली सफलता जनता के भरोसे में है, और यह भरोसा तभी बढ़ेगा जब बिना किसी भेदभाव के समय पर न्याय मिलेगा।
ग्राउंड जीरो पर सुनवाई: अब फरियादियों को मुख्यालय के चक्कर लगाने से मिली मुक्ति।
त्वरित निष्पादन: मौके पर ही अधिकारियों को फाइलें निपटाने के सख्त निर्देश।
संवेदनशीलता: बुजुर्गों और असहायों की सहायता कर पेश की मानवता की मिसाल।
निष्कर्ष: पुलिस अधीक्षक की यह 'ग्राउंड जीरो' वाली कार्यशैली पूरे जिले में चर्चा का विषय बनी हुई है। अब इंसाफ के लिए जनता को भटकना नहीं पड़ रहा, बल्कि न्याय खुद चलकर उनके दरवाजे तक आ रहा है।







