विदेश डेस्क, ऋषि राज।
टोरंटो: कनाडा ने शनिवार को एक महत्वपूर्ण कदम उठाते हुए सीरिया को ‘आतंकवाद प्रायोजक देशों’ की अपनी सूची से हटा दिया। यह वह सूची है जिसमें ऐसे देशों को शामिल किया जाता है जिन्हें आतंकवादी संगठनों का समर्थन करने या उन्हें सहायता प्रदान करने के लिए जिम्मेदार माना जाता है। कनाडा के विदेश मंत्रालय ने यह घोषणा करते हुए स्पष्ट किया कि यह कदम काफी सोच-समझकर उठाया गया है और “हल्के में नहीं लिया गया।”
कनाडा ने साथ ही यह भी बताया कि इस फैसले के तहत इराक और सीरिया में सक्रिय उग्रवादी संगठन हयात तहरीर अल-शाम को आतंकवादी संगठन के दर्जे से हटाने का निर्णय भी शामिल है। अल-शाम (HTS) पहले अल-कायदा से जुड़ा हुआ माना जाता था, लेकिन हाल के वर्षों में इसके संरचनात्मक बदलावों और नए राजनीतिक दावों को देखते हुए कुछ पश्चिमी देशों में इसकी स्थिति पर पुनर्विचार किया जा रहा था।
मित्र देशों के निर्णयों के अनुरूप कदम
कनाडा के विदेश मंत्रालय ने बयान में कहा कि यह फैसला एकतरफा नहीं है, बल्कि “हमारे कई सहयोगियों—विशेष रूप से ब्रिटेन और अमेरिका—द्वारा लिए गए हालिया निर्णयों के अनुरूप” है। इन देशों ने पिछले सप्ताह HTS और सीरिया को लेकर अपनी नीतियों में बदलाव की दिशा में कदम बढ़ाए थे, जिसके बाद कनाडा ने भी स्थिति का पुनर्मूल्यांकन किया।
मंत्रालय ने यह भी कहा कि यह निर्णय सीरियाई सरकार द्वारा देश की स्थिरता बढ़ाने के हालिया प्रयासों और क्षेत्रीय सुरक्षा में सुधार लाने के कदमों को ध्यान में रखते हुए लिया गया है। बयान में लिखा गया:
“कनाडा सीरिया की क्षेत्रीय स्थिरता को आगे बढ़ाने के प्रयासों का समर्थन करता है। यह निर्णय उसी प्रक्रिया का हिस्सा है।”
सीरिया के लिए इसके मायने!
सीरिया को सूची से हटाए जाने का मतलब है कि अब कनाडा सीरियाई सरकार और उससे जुड़े संस्थानों के साथ कुछ क्षेत्रों में सहयोग बढ़ा सकता है। इससे मानवीय सहायता, व्यापारिक लेनदेन, अंतरराष्ट्रीय संपर्क और विकास परियोजनाओं में भी मार्ग सुगम हो सकता है। विशेषज्ञों के अनुसार, यह कदम सीरिया की अंतरराष्ट्रीय वैधता को पुनर्जीवित कर सकता है, हालांकि पश्चिमी देशों में इस मुद्दे पर मतभेद अब भी मौजूद हैं।
आलोचना और समर्थन दोनों:
कनाडा के इस कदम का कुछ मानवाधिकार संगठनों ने विरोध किया है, उनका कहना है कि सीरियाई सरकार अभी भी कई मानवाधिकार समस्याओं के लिए जिम्मेदार है। हालांकि सरकार का तर्क है कि क्षेत्रीय शांति की दिशा में आगे बढ़ने के लिए कूटनीतिक लचीलेपन की आवश्यकता है।
इसके विपरीत, मध्य पूर्व मामलों के विशेषज्ञों का कहना है कि यह बदलाव धीरे-धीरे क्षेत्र में स्थिरता और संवाद की संभावना को बढ़ावा दे सकता है।







