हेल्थ डेस्क, मुस्कान कुमारी
सॉल्ट लेक सिटी। यूटा की बड़ी आबादी पर हुए अध्ययन में पाया गया कि कम शुक्राणु वाले या शुक्राणुहीन पुरुषों के परिवार के सदस्यों में मौत का जोखिम थोड़ा लेकिन सांख्यिकीय रूप से महत्वपूर्ण बढ़ जाता है।
यह खोज स्पर्म क्वालिटी को परिवार की समग्र स्वास्थ्य का संकेतक मानती है, जो साझा जेनेटिक्स और पर्यावरण से प्रभावित होता है।
परिवार के करीबी रिश्तेदारों में ज्यादा असर
अध्ययन में 1996-2017 के बीच सेमेन एनालिसिस कराने वाले पुरुषों के 6,66,437 पहली से तीसरी डिग्री के रिश्तेदारों को शामिल किया गया। परिवारों को शुक्राणु संख्या के आधार पर बांटा गया: एजूस्पर्मिया (शून्य शुक्राणु), ओलिगोस्पर्मिया (39 मिलियन से कम) और नॉर्मोस्पर्मिया (39 मिलियन या अधिक)।
ओलिगोस्पर्मिया वाले परिवारों में सभी कारणों से मौत का जोखिम थोड़ा बढ़ा (HR 1.03), खासकर पहली और दूसरी डिग्री के रिश्तेदारों में। एजूस्पर्मिया परिवारों में भी यही ट्रेंड दिखा, हालांकि सभी रिश्तेदारों के लिए सांख्यिकीय महत्व सीमा पर था। लेकिन करीबी रिश्तेदारों में हृदय रोग, क्रॉनिक रेस्पिरेटरी डिजीज, डाइजेस्टिव डिजीज और मेंटल हेल्थ डिसऑर्डर से मौत का खतरा साफ बढ़ा।
उम्र और कारण के आधार पर जोखिम
बचपन में मौत का खतरा दोनों प्रकार के सबफर्टाइल पुरुषों के परिवारों में बढ़ा, मुख्य रूप से न्यूरोलॉजिकल डिसऑर्डर, हृदय रोग और जन्मजात स्थितियों से। वयस्कों में 40 साल के बाद अंतर ज्यादा दिखा, जिसमें नॉन-कम्युनिकेबल डिजीज, इंजरी और डायबिटीज जैसी मेटाबॉलिक स्थितियां शामिल हैं।
जेनेटिक और पर्यावरणीय कारक जिम्मेदार
शोधकर्ताओं का मानना है कि ये पैटर्न जटिल वंशानुगत कारकों से आते हैं, जो प्रजनन और शारीरिक स्वास्थ्य दोनों को प्रभावित करते हैं। मीओटिक रिपेयर में जेनेटिक वैरिएंट से लेकर साझा जीवनशैली और पर्यावरणीय एक्सपोजर तक शामिल हैं। पुरुष फर्टिलिटी जांच परिवार की स्वास्थ्य दिशा जानने का माध्यम बन सकती है, जो रोकथाम की रणनीतियां बनाने में मदद करेगी।







