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छौड़ादानो : सड़क नहीं, नरक का दलदल

लोकल डेस्क, एन. के. सिंह।

मोतिहारी की 'जीवनरेखा' बनी 'मौत का कुआँ': छौड़ादानो बाज़ार की मुख्य सड़क पर 3 फीट गहरे सड़ांध से आक्रोश, स्थानीय लोगों का सवाल: प्रशासन किस बड़ी दुर्घटना का इंतज़ार कर रहा है?

पूर्वी चंपारण: जिले की वह सड़क, जिसे मोतिहारी से भारत-नेपाल सीमा को जोड़ने वाली 'जीवनरेखा' कहा जाता है, आज छौड़ादानो बाज़ार के आदर्श नगर के पास 'नर्क की नाली' में तब्दील हो चुकी है। यह अति-महत्वपूर्ण मुख्य मार्ग बीते कई वर्षों से लगभग 3 फीट गहरे, सड़े हुए नाली के पानी में डूबा हुआ है, जिसने राहगीरों के लिए आवागमन को एक जानलेवा चुनौती बना दिया है।

मौत का दलदल और बढ़ता खतरा

आदर्श नगर का यह हिस्सा अब केवल जल-जमाव नहीं रहा, यह शहर भर के कचरे और गंदे पानी का एक स्थायी दलदल बन गया है, जहाँ से निकलना राहगीरों के लिए हर पल एक जोखिम है। दुर्घटनाओं का सिलसिला: स्थानीय ग्रामीणों के अनुसार, इस 'मौत के दलदल' के कारण आए दिन गंभीर सड़क दुर्घटनाएँ होती हैं। 3 फीट गहरे पानी के भीतर सड़क का अंदाज़ा न होने से कई दोपहिया वाहन चालक गिरकर चोटिल हो चुके हैं, और दुखद रूप से कई निर्दोष लोगों की जान भी जा चुकी है।

स्वास्थ्य का संकट: सड़े हुए पानी से उठने वाली तीव्र दुर्गंध के कारण यहाँ से गुज़रना दूभर हो गया है। राहगीरों को रुमाल या दुपट्टे से मुँह ढकना पड़ता है। यह सड़ांध मच्छरों और बीमारियों के प्रकोप को लगातार बढ़ा रही है, जिससे स्थानीय लोगों का स्वास्थ्य खतरे में है।

आँखों पर पट्टी बाँधकर निकलते हैं 'माननीय'

स्थानीय लोगों में प्रशासन और जनप्रतिनिधियों के प्रति गहरा आक्रोश है। उनका कहना है कि यह बदहाली किसी उपेक्षित गाँव की नहीं, बल्कि जिले की मुख्य सड़क की है।

 "यह सड़क महज़ एक मार्ग नहीं है, यह वर्षों से बहते प्रशासन के उपेक्षापूर्ण रवैये का प्रमाण है।" – एक आक्रोशित स्थानीय ग्रामीण

सबसे शर्मनाक स्थिति यह है कि जिले के बड़े-बड़े अधिकारी और माननीय नेता इसी मार्ग से गुज़रते हैं। ग्रामीणों का आरोप है कि नेतागण अपनी गाड़ियों के शीशे चढ़ाकर या मुँह पर रूमाल रखकर इस सड़े हुए पानी के बीच से ऐसे निकल जाते हैं, मानो उनकी आँखों पर पट्टी बंधी हो और उन्हें लोगों की तकलीफें दिखाई ही नहीं देतीं।

'झूठे वादे' बने ढाक के तीन पात

समस्या के समाधान के लिए अब तक जितने भी बड़े-बड़े सरकारी वादे हुए हैं, वे केवल 'ढाक के तीन पात' बनकर रह गए हैं। अधिकारी और नेताओं ने निरीक्षण के दौरान इस समस्या से निजात दिलाने की घोषणाएँ तो कीं, लेकिन जमीनी स्तर पर कोई ठोस काम नहीं हुआ। सरकारी फाइलें आती-जाती रहीं, मगर सड़क किनारे बहती नाली की सड़ांध में डूबी 'आदर्श नगर' की पहचान नहीं बदली।

प्रशासन पर सीधा सवाल

सड़े हुए पानी की दुर्गंध, मच्छरों का प्रकोप और जानलेवा दुर्घटनाओं से जूझ रहे स्थानीय ग्रामीणों ने अब सीधे तौर पर प्रशासन से सवाल करना शुरू कर दिया है।

  • क्या प्रशासन किसी बड़ी दुर्घटना या महासंकट का इंतज़ार कर रहा है?
  • क्या लोगों की जान की कीमत कागज़ पर किए गए वादों से भी कम है?

ग्रामीणों ने चेतावनी दी है कि यदि जल्द ही इस 'नर्क की नाली' से मुक्ति नहीं मिली, तो वे बड़े पैमाने पर सड़क जाम कर विरोध प्रदर्शन करने को बाध्य होंगे। यह बदहाली केवल एक सड़क की नहीं, बल्कि समूचे पूर्वी चंपारण की प्रशासनिक व्यवस्था की पोल खोल रही है।