नेशनल डेस्क, एन के सिंह।
मोतिहारी में जॉर्ज ऑरवेल की जन्मस्थली: करोड़ों का मखौल और इतिहास की मर्माहत कर देने वाली उपेक्षा।
पूर्वी चम्पारण/ मोतिहारी। 'एनिमल फार्म' और '1984' जैसे कालजयी उपन्यासों के जरिए सत्ता की निरंकुशता पर चोट करने वाले ब्रितानी लेखक जॉर्ज ऑरवेल (एरिक आर्थर ब्लेयर) ने शायद कभी नहीं सोचा होगा कि उनकी अपनी जन्मस्थली ही एक दिन सरकारी संवेदनहीनता और 'सिस्टम' की निरंकुशता का सबसे वीभत्स उदाहरण बन जाएगी। देश के सुप्रसिद्ध हिंदी फिल्मी दुनिया के डायरेक्टर अनुभव सिन्हा, ने गांधी संग्रहालय, और मशहूर लेखक की जन्मस्थली का निरीक्षण कर, दुख व्यक्त किया और कहां की, बिहार के मोतिहारी का वह घर, जहाँ 25 जून 1903 को विश्व साहित्य के इस शिखर पुरुष ने पहली सांस ली थी, आज अपनी बदहाली पर आंसू बहा रहा है।
खंडहर में तब्दील होता इतिहास
बुधवार को जब हिंदी सिनेमा के जाने-माने निर्देशक हैं अनुभव सिन्हा,और उपन्यासकार फिल्मकार विश्वजीत मुखर्जी इस ऐतिहासिक स्थल पर पहुँचे, तो वहां का दृश्य देखकर उनकी आँखें नम हो गईं। संरक्षण के बड़े-बड़े दावों के बीच सच्चाई यह है कि यह परिसर आज 'मानव मलमूत्र और गंदगी' का केंद्र बन चुका है।
निर्देशक अरुण सिंह ने भारी मन से कहा, "एक विश्वविख्यात लेखक की जन्मस्थली की ऐसी दुर्दशा देखकर जो पीड़ा हो रही है, उसे शब्दों में बयां करना नामुमकिन है। यह केवल साहित्य का अपमान नहीं है, बल्कि हमारी विरासत के प्रति हमारी सामूहिक संवेदनहीनता का जीवंत प्रमाण है।"
सरकारी फाइलों में 'विकास', जमीन पर 'विनाश'
अभिलेखों के अनुसार, दिसंबर 2010 में बिहार सरकार ने इसे संरक्षित पर्यटन स्थल घोषित किया था। अगस्त 2014 में कला, संस्कृति एवं युवा विभाग ने करीब 50 लाख रुपये की लागत से जीर्णोद्धार का कार्य भी कागजों पर शुरू किया। लेकिन आज की हकीकत इन आंकड़ों को मुँह चिढ़ा रही है:
दिखावे की पट्टिका: परिसर में अब केवल एक धूल धूसरित नामपट्टिका शेष है।
गंदगी का साम्राज्य: रखरखाव के अभाव में पूरा भवन खंडहर हो चुका है और आसपास कूड़े के ढेर लगे हैं।
अंधकार में भविष्य: करोड़ों के फंड का दावा करने वाले प्रशासन की चुप्पी इस ऐतिहासिक विरासत को निगल रही है।
गांधी की कर्मभूमि और ऑरवेल का विरोधाभास
मोतिहारी को यह दुर्लभ गौरव प्राप्त है कि यह महात्मा गांधी के 'सत्याग्रह' की कर्मभूमि है और जॉर्ज ऑरवेल की जन्मभूमि। विडंबना यह है कि जहाँ गांधी संग्रहालय को सहेजने के प्रयास दिखते हैं, वहीं ऑरवेल की विरासत को "ऐतिहासिक भूल" मानकर छोड़ दिया गया है। यह वही इलाका है जहाँ ऑरवेल के पिता रिचर्ड ब्लेयर अफीम विभाग में तैनात थे। जिस अफीम गोदाम के सामने ऑरवेल का जन्म हुआ, वह आज संरक्षण के बजाय विनाश की राह पर है।
साहित्य प्रेमियों का आक्रोश
चंपारण की मिट्टी से निकले मशहूर लेखक अमितवा कुमार आज वैश्विक मंच पर ऑरवेल की विरासत को जीवित रखे हुए हैं, लेकिन उनकी अपनी ही जमीन पर ऑरवेल का नाम मिटाया जा रहा है। स्थानीय प्रबुद्ध जनों और साहित्य प्रेमियों में जिला प्रशासन, नगर निगम और पर्यटन विभाग की इस रहस्यमयी चुप्पी को लेकर गहरा आक्रोश है।
एक आखिरी पुकार यदि समय रहते इस स्थल को गंदगी और उपेक्षा से मुक्त नहीं कराया गया, तो मोतिहारी के माथे से 'विश्व साहित्य की जन्मस्थली' का यह गौरवशाली तिलक सदा के लिए मिट जाएगा। यह केवल एक ईंट-पत्थर के घर की बर्बादी नहीं है, बल्कि एक महान सोच और वैश्विक इतिहास की सरेआम हत्या है। क्या हमारा प्रशासन इस वैश्विक विरासत को सहेजने के लायक भी है? यह सवाल आज हर साहित्य प्रेमी की आंखों में आंसू बनकर तैर रहा है।







