नेशनल डेस्क, आर्या कुमारी ।
नई दिल्ली: मोदी सरकार के “संचार साथी” ऐप को लेकर देश में राजनीतिक टकराव और सार्वजनिक बहस तेज हो गई है। ऐप को अनिवार्य रूप से सभी मोबाइल फोन में प्री-इंस्टॉल कराने के सरकारी निर्देश के बाद विपक्ष, टेक कंपनियों और डिजिटल प्राइवेसी विशेषज्ञों ने गंभीर आपत्तियाँ दर्ज कीं। बढ़ते विरोध के बीच सरकार को आदेश वापस लेना पड़ा।
कांग्रेस का आरोप: “यह जासूसी का नया हथियार”
कांग्रेस प्रवक्ता पवन खेड़ा ने कहा कि मोदी सरकार “हर बार नागरिकों की निजता पर सेंध लगाने का प्रयास करती है” और यह ऐप “डिजिटल जासूसी” का माध्यम बन सकता है। राजीव शुक्ला ने बयान में कहा: “सरकार नागरिकों की निजी ज़िंदगी में झाँकना चाहती है। यह लोकतंत्र के लिए खतरनाक है।” विपक्ष का दावा है कि ऐप फोन लोकेशन, कॉल रिकॉर्ड और मैसेजिंग एक्सेस जैसी परमिशन्स मांग सकता है, जो भारतीय नागरिकों की मौलिक गोपनीयता के मूल अधिकार पर हमला है।
सरकार की सफाई: “ऐप सुरक्षा के लिए है, जासूसी के लिए नहीं”
केंद्र सरकार और दूरसंचार विभाग (DoT) का कहना है कि यह ऐप मोबाइल चोरी, फर्जी आईएमईआई नंबर, और साइबर फ्रॉड रोकने के लिए बनाया गया है। केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया ने कहा “संचार साथी जासूसी ऐप नहीं है। इसका उद्देश्य नागरिकों की सुरक्षा है, न कि निगरानी। अगर कोई चाहें, तो इसे डिसेबल या अनइंस्टॉल भी कर सकते हैं।”
टेक कंपनियों और विशेषज्ञों ने जताई चिंता
कई स्मार्टफोन कंपनियों, विशेषकर एप्पल और गूगल आधारित प्लेटफार्मों ने कहा कि सरकार का “अनिवार्य प्रीलोड ऑर्डर” अंतरराष्ट्रीय डेटा स्वतंत्रता और डिवाइस स्वामित्व सिद्धांतों के खिलाफ है।
डिजिटल अधिकार विशेषज्ञों ने यह सवाल उठाया:
क्या सरकार बिना जन-बहस और बिना डेटा संरक्षण ढांचे के, नागरिकों के डिवाइस में ऐप डाल सकती है?
विवाद के बाद यू-टर्न
जोरदार विरोध, सोशल मीडिया अभियानों और विपक्षी दबाव के बाद सरकार ने 3 दिसंबर को आदेश वापस ले लिया। अब यह ऐप वैकल्पिक (optional) रहेगा और उपयोगकर्ता चाहें तो इसे इंस्टॉल कर सकते हैं।
बड़ी तस्वीर: सवाल अभी भी बाकी
संचार साथी विवाद यह दिखाता है कि भारत में डिजिटल सुरक्षा और नागरिक गोपनीयता के बीच संघर्ष अभी खत्म नहीं हुआ है।
विशेषज्ञों का कहना है कि:
• नागरिक सुरक्षा जरूरी है
• लेकिन निगरानी की शक्ति पारदर्शी और कानूनी निगरानी में होनी चाहिए
सरकार ने फिलहाल कदम पीछे खींच लिया है, लेकिन यह घटना भारत में एक गहरी बहस छोड़ गई है; क्या डिजिटल सुरक्षा के नाम पर राज्य नागरिकों की निजता पर सीमाएं तय करेगा, या नागरिक स्वयं अपनी डिजिटल सीमाएँ तय करेंगे?







