नेशनल डेस्क, आर्या कुमारी।
सुप्रीम कोर्ट ने तलाकशुदा मुस्लिम महिलाओं के अधिकारों को मजबूती देते हुए एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। रौशनारा बेगम के मामले में अदालत ने स्पष्ट किया कि विवाह के समय पिता या रिश्तेदारों द्वारा पति को दिए गए नकद और गहने महिला की संपत्ति हैं और तलाक के बाद उन्हें वापस करना अनिवार्य है। यह अधिकार मुस्लिम महिला (तलाक पर अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम, 1986 की धारा 3 के तहत सुनिश्चित है।
रौशनारा बेगम ने अपने पूर्व पति से 7 लाख रुपये और 30 ग्राम सोने की वापसी के लिए सुप्रीम कोर्ट में अपील की थी। इससे पहले कलकत्ता हाईकोर्ट ने उनके दावे को यह कहते हुए खारिज कर दिया था कि विवाह रजिस्टर और काजी के बयान में कुछ असंगतियां थीं। सुप्रीम कोर्ट ने इस तर्क को ठुकराते हुए कहा कि ऐसे दस्तावेज केवल संदेह के आधार पर अस्वीकार नहीं किए जा सकते।
शीर्ष अदालत ने कहा कि निकाह के समय दिए गए धन और गहने महिला की भविष्य की सुरक्षा का हिस्सा हैं। अदालत ने 1986 कानून की व्याख्या महिला की गरिमा, समानता और आर्थिक सुरक्षा के संवैधानिक अधिकारों के आधार पर की तथा अनुच्छेद 21 के तहत इसे मानवाधिकार के दायरे में बताया।
सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट का फैसला रद्द करते हुए इंजाम दिया कि रौशनारा के पूर्व पति को 7 लाख रुपये और 30 ग्राम सोने का मूल्य सीधे महिला के खाते में जमा करना होगा। आदेश का पालन न करने पर 9% वार्षिक ब्याज लागू होगा और उन्हें अनुपालन का हलफनामा भी देना होगा।
अदालत ने यह भी कहा कि 1986 अधिनियम की धारा 3(1)(d) के अनुसार तलाकशुदा मुस्लिम महिला को वह सभी संपत्ति वापस लेने का अधिकार है, जो उसे शादी से पहले, शादी के दौरान या बाद में रिश्तेदारों, दोस्तों, पति या ससुराल वालों द्वारा दी गई हो।
फैसले में पीठ ने यह टिप्पणी भी की कि संविधान सभी नागरिकों के लिए समानता और गरिमा की गारंटी देता है, और इस लक्ष्य को पाने के लिए अदालतों को सामाजिक न्याय के दृष्टिकोण से कानून की व्याख्या करनी चाहिए। अदालत के मुताबिक, यह कानून मुस्लिम महिलाओं को तलाक के बाद सम्मानजनक और सुरक्षित जीवन सुनिश्चित करने के लिए बनाया गया है।
इस निर्णय के साथ सुप्रीम कोर्ट ने एक बार फिर स्पष्ट किया कि महिलाओं की इज्जत, बराबरी और आर्थिक सुरक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता है और किसी भी विवाद में इन मूल्यों को ध्यान में रखते हुए ही न्याय किया जाना चाहिए।







