मुस्कान कुमारी, बिजनेस डेस्क
नई दिल्ली। केंद्र सरकार की नई श्रम संहिताओं के तहत औद्योगिक इकाइयों में छंटनी संबंधी नियम काफी नरम हो गए हैं। अब 300 से कम कर्मचारियों वाले प्रतिष्ठानों में मालिकों को ले-ऑफ या रिट्रेंचमेंट के लिए सरकारी मंजूरी नहीं लेनी होगी। ऑल इंडिया ट्रेड यूनियन कांग्रेस (एटक) की महासचिव अमरजीत कौर ने इसे ‘हायर एंड फायर’ को बढ़ावा देने वाली व्यवस्था बताते हुए कहा कि इस बदलाव से देश की बड़ी संख्या में छोटी फैक्टरियां सरकार की निगरानी से बाहर हो जाएंगी और सिर्फ नोटिस व मुआवजा देकर कर्मचारियों को हटाया जा सकेगा।
300 कर्मचारियों की नई सीमा, 100 का पुराना प्रावधान खत्म
औद्योगिक संबंध संहिता, 2020 के प्रावधानों के अनुसार, ले-ऑफ, रिट्रेंचमेंट और यूनिट बंद करने के लिए अब सिर्फ वे संस्थान अनुमति के दायरे में आएंगे जिनमें 300 या उससे अधिक कर्मचारी हों। इससे पहले यह सीमा 100 कर्मचारियों की थी। एटक महासचिव ने कहा कि अधिकतर छोटी और मध्यम इकाइयों का कर्मचारी आधार 300 से कम है, इसलिए बड़ी संख्या में श्रमिकों पर सरकारी हस्तक्षेप का संरक्षण खत्म हो गया है।
60-70 प्रतिशत उद्योग प्रभावित होने की आशंका
कौर ने बताया कि ट्रेड यूनियनों द्वारा संकलित रिपोर्टों और अध्ययनों के मुताबिक, 60-70 प्रतिशत औद्योगिक इकाइयों में कर्मचारियों की संख्या 300 से कम है। हालांकि यह आधिकारिक सरकारी आंकड़ा नहीं है, लेकिन यूनियनों का मानना है कि छोटे और मझोले उद्योगों में काम करने वाले लाखों कर्मचारी इस नए प्रावधान से प्रभावित हो सकते हैं, क्योंकि उन्हें अब छंटनी के दौरान सरकारी सुरक्षा कवच नहीं मिलेगा।
फैक्टरी की परिभाषा में बदलाव, कई इकाइयाँ सुरक्षा दायरे से बाहर
व्यावसायिक सुरक्षा, स्वास्थ्य एवं कार्य परिस्थिति संहिता, 2020 में फैक्टरी की नई परिभाषा लागू की गई है। संशोधित नियमों के तहत अब पावर के साथ 20 और बिना पावर के 40 कर्मचारियों वाली इकाइयों पर ही प्रमुख सुरक्षा प्रावधान लागू होंगे। पहले यह सीमा क्रमश: 10 और 20 थी। यूनियनों का तर्क है कि इस बदलाव से हजारों माइक्रो और स्मॉल यूनिट्स सुरक्षा अधिकारी, स्वास्थ्य सुविधाएं और अन्य अनिवार्य सुरक्षा उपायों की बाध्यता से मुक्त हो जाएंगी, जिससे श्रमिकों के लिए जोखिम बढ़ सकता है।
सरकार का पक्ष: प्रक्रियाओं में सरलता और बेहतर सामाजिक सुरक्षा
केंद्र सरकार का कहना है कि नई संहिताएँ श्रम सुधारों का हिस्सा हैं, जिनसे व्यवसाय करने में आसानी बढ़ेगी, कागजी औपचारिकताएँ कम होंगी और न्यूनतम वेतन व सामाजिक सुरक्षा का बेहतर ढांचा उपलब्ध होगा। वहीं एटक, इंटक, सीटू, एचएमएस सहित दस केंद्रीय ट्रेड यूनियनों ने इन संहिताओं को उद्योगपतियों के हित में बताते हुए कहा है कि इनसे स्थायी रोजगार में कमी आएगी और ठेका आधारित कार्य प्रणाली को बढ़ावा मिलेगा।
मुख्य बदलाव:
सरकारी अनुमति की बाध्यता: अब सिर्फ 300+ कर्मचारियों वाली इकाइयों में ले-ऑफ और रिट्रेंचमेंट पर अनुमति अनिवार्य
पुराना प्रावधान: 100+ कर्मचारियों वाली फैक्टरियों में अनिवार्य थी अनुमति
छोटी इकाइयों में प्रभाव: नोटिस और मुआवजा देकर छंटनी संभव, सरकार रोक नहीं पाएगी
फैक्टरी थ्रेशहोल्ड: पावर के साथ 20 और बिना पावर के 40 कर्मचारियों वाली इकाइयाँ ही सुरक्षा नियमों के दायरे में
ट्रेड यूनियन प्रतिनिधियों का कहना है कि यदि इन प्रावधानों को व्यापक स्तर पर लागू किया गया तो छोटे उद्योगों में असंतोष बढ़ सकता है, जहां कार्यरत करोड़ों श्रमिक रोजगार असुरक्षा का सामना कर सकते हैं।







