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मनरेगा की जगह नया कानून: 125 दिन रोजगार, राज्यों पर 40% बोझ

नेशनल डेस्क, मुस्कान कुमारी 

नई दिल्ली। केंद्र सरकार मनरेगा को खत्म कर नया विकसित भारत—गारंटी फॉर रोजगार एंड अजीविका मिशन (ग्रामीण) बिल 2025 ला रही है, जो ग्रामीण परिवारों को 100 की बजाय 125 दिन गारंटीड मजदूरी रोजगार देगा। लेकिन फंडिंग में बड़ा बदलाव—अब राज्यों पर 40% खर्च का बोझ आएगा, जबकि पहले मजदूरी का पूरा पैसा केंद्र देता था।

संसद के शीतकालीन सत्र में इस हफ्ते लोकसभा में पेश होने वाला यह बिल ग्रामीण रोजगार की व्यवस्था को पूरी तरह बदल देगा। विकसित भारत 2047 विजन से जुड़ा यह कानून मनरेगा एक्ट 2005 को रिपील करेगा, जिसमें रोजगार के दिन बढ़ाने के साथ-साथ केंद्र का नियंत्रण बढ़ेगा और राज्यों की जिम्मेदारी भी।

125 दिन गारंटी: ग्रामीणों के लिए बड़ी राहत

बिल में हर ग्रामीण परिवार के वयस्क सदस्यों को अकुशल मैनुअल वर्क के लिए सालाना 125 दिन की गारंटीड मजदूरी रोजगार का प्रावधान है। पहले मनरेगा में यह 100 दिन था। मजदूरी दरें वही रहेंगी, जो मनरेगा के सेक्शन 6 के तहत नोटिफाइड हैं। अगर 15 दिन में काम न मिले तो बेरोजगारी भत्ता मिलेगा, जिसका खर्च राज्य वहन करेंगे। देरी से पेमेंट पर 0.05% प्रतिदिन जुर्माना भी जारी रहेगा। यह बदलाव लाखों ग्रामीण मजदूरों के लिए फायदा पहुंचा सकता है, खासकर जहां मांग ज्यादा है। लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि असली तस्वीर फंडिंग और लागू करने में छिपी है।

 फंडिंग में उलटफेर: राज्यों पर अतिरिक्त बोझ

सबसे बड़ा बदलाव फंड शेयरिंग में है। सामान्य राज्यों और विधायिका वाले केंद्रशासित प्रदेशों में केंद्र-राज्य अनुपात 60:40 होगा। उत्तर-पूर्वी और हिमालयी राज्यों (उत्तराखंड, हिमाचल, जम्मू-कश्मीर सहित) में यह 90:10 रहेगा।

पहले मनरेगा में अकुशल मजदूरी का पूरा खर्च, सामग्री का तीन-चौथाई और कुशल मजदूरी का तीन-चौथाई केंद्र उठाता था। अब राज्यों को सालाना 50,000 करोड़ रुपये अतिरिक्त खर्च करना पड़ सकता है। केरल जैसे राज्य पर 2,000-2,500 करोड़ का बोझ बढ़ेगा।

केंद्र का बढ़ता नियंत्रण: नॉर्मेटिव एलोकेशन

बिल में केंद्र को हर साल राज्यवार नॉर्मेटिव एलोकेशन तय करने का अधिकार है, जो ऑब्जेक्टिव पैरामीटर्स पर आधारित होगा। मनरेगा डिमांड-ड्रिवेन था—मांग पर केंद्र फंड देता था। अब फिक्स्ड बजट होगा, फंड खत्म तो अधिकार भी खत्म।

राज्य कृषि पीक सीजन में स्कीम को पॉज कर सकेंगे, ताकि खेतों में मजदूर उपलब्ध रहें। कमजोर वर्गों (महिलाएं, बुजुर्ग, दिव्यांग) के लिए स्पेशल रेट्स होंगे।

नई संस्थाएं: काउंसिल और स्टीयरिंग कमिटी

केंद्र और राज्य स्तर पर ग्रामीण रोजगार गारंटी काउंसिल बनेगी, जो स्कीम की मॉनिटरिंग करेगी। स्टीयरिंग कमिटी एलोकेशन, कन्वर्जेंस और ऑपरेशनल मुद्दों पर सिफारिशें देगी।

प्लानिंग में जीआईएस टूल्स, पीएम गति शक्ति और सेंट्रल डिजिटल स्टैक अनिवार्य होंगे। पंचायतों की भूमिका कम, डिजिटल डैशबोर्ड्स की ज्यादा।

 विपक्ष का हमला: अधिकार छीने जा रहे

सीपीआई(एम) सांसद जॉन ब्रिटास ने बिल को "राज्यों और मजदूरों के खिलाफ" बताया। उन्होंने कहा, "125 दिन हेडलाइन है, 60:40 फाइन प्रिंट। मनरेगा में मजदूरी का पूरा फंड केंद्र का था, अब राज्य 40% दें। यह स्टेल्थ से कॉस्ट शिफ्टिंग है।"

ब्रिटास के मुताबिक, पंचायतें साइडलाइन, डैशबोर्ड्स सेंटर में। कृषि सीजन में काम रोकना मजदूरों की पसंद छीनता है। "यह बिल मनरेगा को फिस्कली, इंस्टीट्यूशनली और मोरली डिस्मैंटल करता है।"

बिल विकसित भारत नेशनल रूरल इंफ्रास्ट्रक्चर स्टैक बनाएगा, जहां एसेट्स इंटीग्रेट होंगे। लेकिन विपक्ष इसे सेंट्रलाइजेशन बता रहा है।