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अमेरिकी अदालत ने ट्रंप टैरिफ पर लगाई रोक

विदेश डेस्क, आर्या कुमारी।

वॉशिंगटन, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को अंतरराष्ट्रीय व्यापार अदालत से बड़ा झटका लगा है। अदालत ने ट्रंप प्रशासन द्वारा कई देशों पर लगाए गए 25 प्रतिशत टैरिफ से जुड़े आदेश को रद्द कर दिया। कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि राष्ट्रपति ने कांग्रेस की मंजूरी के बिना यह कदम उठाकर संवैधानिक सीमाओं का उल्लंघन किया है।

यह मामला कई बड़े अमेरिकी व्यापार संगठनों और हजारों कारोबारियों की ओर से अदालत में चुनौती के रूप में दायर किया गया था। याचिकाकर्ताओं का कहना था कि इतने बड़े आर्थिक फैसले को लागू करने का अधिकार केवल कांग्रेस के पास है और राष्ट्रपति अकेले ऐसा निर्णय नहीं ले सकते। अदालत ने इस तर्क को सही मानते हुए टैरिफ आदेश पर रोक लगा दी।

कोर्ट के फैसले के बाद अरबों डॉलर के अंतरराष्ट्रीय व्यापार पर असर डालने वाले इन शुल्कों का भविष्य फिलहाल अनिश्चित हो गया है। माना जा रहा है कि इस निर्णय से अमेरिका के व्यापारिक संबंधों और वैश्विक बाजारों पर भी व्यापक प्रभाव पड़ सकता है।

फैसले के बाद राष्ट्रपति ट्रंप ने तीखी प्रतिक्रिया देते हुए न्यायपालिका पर निशाना साधा। उन्होंने अदालत के निर्णय को अमेरिका विरोधी बताते हुए कहा कि न्यायाधीशों को देश की नीतियां तय करने की अनुमति नहीं दी जा सकती। ट्रंप ने यहां तक कहा कि वह संबंधित जजों को “बर्खास्त” करने जा रहे हैं।
हालांकि कानूनी विशेषज्ञों ने ट्रंप के इस बयान को लेकर स्पष्ट किया कि अमेरिकी राष्ट्रपति के पास संघीय न्यायाधीशों को हटाने का अधिकार नहीं होता। अमेरिकी संविधान के अनुच्छेद-3 के तहत संघीय जजों की नियुक्ति आजीवन मानी जाती है और उन्हें केवल विशेष संवैधानिक प्रक्रिया के जरिए ही पद से हटाया जा सकता है।

ट्रंप ने अपने फैसले का बचाव करते हुए कहा कि ये टैरिफ अमेरिकी नौकरियों और राष्ट्रीय सुरक्षा की रक्षा के लिए जरूरी थे। उन्होंने संकेत दिया कि प्रशासन इस मामले को सुप्रीम कोर्ट तक ले जा सकता है और अदालत के फैसले के खिलाफ आगे कानूनी लड़ाई जारी रखेगा।

अदालत के इस फैसले के बाद वैश्विक बाजारों और अमेरिकी रिटेल कारोबारियों के बीच असमंजस की स्थिति पैदा हो गई है। कई व्यापारिक कंपनियां पहले ही टैरिफ के कारण कीमतें बढ़ने की आशंका जता रही थीं। वहीं ट्रंप विरोधियों ने इसे कानून के शासन और संवैधानिक संतुलन की जीत बताया है, जबकि उनके समर्थकों का कहना है कि न्यायपालिका राष्ट्रपति की व्यापार नीति में दखल दे रही है।