लोकल डेस्क, ऋषि राज।
रक्सौल: जीवन यात्रा है और हम यात्री हैं।एक यात्रा हमारी बाह्यजगत् में चल रही है और एक यात्रा हमारी अंतर्जगत में चल रही है।उक्त विचार लायंस क्लब ऑफ रक्सौल के अध्यक्ष सह मीडिया प्रभारी एवं भारत विकास परिषद् , रक्सौल के सेवा संयोजक सह मीडिया प्रभारी सह सामाजिक कार्यकर्ता बिमल सर्राफ ने प्रेस से साझा किया।
जो आसक्ति के वश में हो जाते हैं अर्थात जो राग और द्वेष के वश में हो जाते हैं, वे बाह्यजगत् में तो गतिशील रहते हैं, लेकिन अन्तर्जगत में ठहर जाते हैं।आसक्ति के दो रूप होते हैं।उसका विधेयात्मक रूप है, उसका सकारात्मक पक्ष है - राग।उसका नकारात्मक पक्ष है - द्वेष।सकारात्मक और नकारात्मक इसलिए कहा गया ; क्योंकि राग होता है तो हम क्षणमात्र के लिए ही सही थोड़ा-सा सुख और सुकून अनुभव कर लेते हैं। द्वेष होता है तो हम जलते कुढ़ते रहते हैं, परेशान रहते हैं, लेकिन राग हो या द्वेष हो, ठहरते तो हम हैं ही - वहीं टिक जाते हैं,रुक जाते हैं। मन का किसी चीज से चिपक जाना, कहीं पर ठहर जाना ही आसक्ति है।
मन जब आसक्त होता है तो उसे छोड़ता नहीं एवं उसी के इर्द-गिर्द घूमता रहता है। आसक्तिवश हम कर्म करते हैं।आसक्ति हमें कर्म करने के लिए प्रेरित करती है।आसक्ति का मतलब यह नहीं कि हम किसी से प्रेम करते हैं, तो आसक्ति है।आसक्ति का मतलब है कि हम जिन परिस्थितियों में हैं, उन्हीं से चिपके हुए हैं।हम जड़ हो गए हैं, वहीं पे ठहर गए हैं।हमारा ठहरना, हमारा ठहराव ही आसक्ति है।जब तक आसक्ति की डोर से बंधे हुए हैं, तब तक ही अन्यथा आसक्ति से छुटकारा मुश्किल है।आसक्ति की डोर ऐसी ही है।कई बार तो जन्मों-जन्मों तक, कई बार हजारों-हजारों साल तक वहीं रहते हैं।शरीर छूट जाता है, लेकिन आसक्त मन वहीं ठहर जाता है।







