लोकल डेस्क, ऋषि राज।
रक्सौल: निराशा जीवन का एक ऐसा सत्य है,जिससे इंसान जीवन में यदा-कदा रूबरू होता रहता है।निराशा का अंधकार भरा दौर जीवन को नर्क बना देता है।इंसान की सोचने-समझने की शक्ति क्षीण हो जाती है।
उक्त विचार लायंस क्लब ऑफ रक्सौल के अध्यक्ष सह मीडिया प्रभारी एवं भारत विकास परिषद् , रक्सौल के सेवा संयोजक सह मीडिया प्रभारी सह सामाजिक कार्यकर्ता बिमल सर्राफ ने प्रेस से साझा किया।निराशा से जीवन का सुख-चैन,उत्साह-उमंग सब जैसे छिन जाते हैं और व्यक्ति एक दिशाहीन अंधेरी सुरंग में घुट-घुटकर जीने के लिए अभिशप्त हो जाता है।निराशा एक अभिशाप है,मनुष्य का सबसे बड़ा शत्रु है,जो जीवन को घुन की तरह चाट कर खोखला कर देती है।निराशा में जकड़ा हुआ मन-मस्तिष्क निषेधात्मक प्रवृतियों का घर बन जाता है,जिससे क्षोभ,क्रोध,आवेश,हताशा जैसे अनेकों विकार उत्पन्न हो जाते हैं।
बात-बात पर चिढ़ना, कुढ़ना और कुंठित होना,व्यक्ति का स्वभाव बन जाता साथ ही ऐसे व्यक्तियों के साथ कोई बैठना तो दूर, यों कहे कि बात-चीत करना भी पसंद नहीं करता है।निराशहीन व्यक्ति पुरुषार्थ से अधिक भाग्य पर विश्वास करने लगता है।सोचता है कि जो भाग्य में लिखा होगा, वही तो होगा।पुरुषार्थ के बल पर अपने भाग्य-निर्माण की बात भूल कर एक हताश,निराश व उदासीन जीवन जीता है।निराश व्यक्ति आत्मसमीक्षा व निरीक्षण की क्षमता भी खो बैठता है।अपने विचारों को कार्यरूप में परिणत न कर पाना भी निराशा को जन्म देता है।अपने यथार्थ को स्वीकार न कर पाना निराशा का एक बड़ा कारण है।जीवन में उत्साह व साहस की कमी इसी से पनपती जिसके चलते इंसान संघर्षों से बचना चाहता जो मनुष्य की सबसे बड़ी भूल रहती है।इस तरह निराशा एक तरह से पलायन से उपजी स्थिति होती है,जिसके चलते व्यक्ति जीवन-संग्राम से भयभीत होकर भागा-भागा फिरता है।
इसलिए सबसे पहले व्यक्ति को अपने स्वयं के यथार्थ का मूल्यांकन अभीष्ट है फिर छोटे-छोटे प्रयास करते रहना जरूरी,इससे छोटी-छोटी सफलताएं आपके मनोबल एवं आत्मविश्वास में वृद्धि करती जायेंगी।आप अपना श्रेष्ठतम प्रयास-पुरुषार्थ करते रहें व शेष ईश्वर पर छोड़ दें।जो भी होगा श्रेष्ठतम ही होगा,इसके प्रति आश्वस्त रहें।कर्म और ईश्वरीय साधना ही निराशा से आशा की ओर जाने वाले रास्ते का मुख्य आधार एवं अभीष्ट है।







