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ग्वालियर कृषि विश्वविद्यालय ने हवा में उगाए आलू, जानिए कैसे?

नेशनल डेस्क, नीतीश कुमार।

मध्यप्रदेश के ग्वालियर में स्थित राजमाता विजयाराजे सिंधिया कृषि विश्वविद्यालय ने खेती के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण सफलता हासिल की है। विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों ने एरोपोनिक तकनीक के माध्यम से हवा और पानी की मदद से आलू उगाने में कामयाबी पाई है। यह तकनीक भविष्य में किसानों की आय बढ़ाने और बेहतर उत्पादन सुनिश्चित करने में सहायक साबित हो सकती है।

हवा में तैयार हो रहा आलू बीज

इस तकनीक के तहत आलू की खेती पारंपरिक मिट्टी आधारित पद्धति से अलग की जाती है। एरोपोनिक सिस्टम में पौधों की जड़ों को हवा में रखा जाता है और पोषक तत्वों का छिड़काव फॉगिंग सिस्टम के जरिए किया जाता है। इसी प्रक्रिया से विश्वविद्यालय में आलू के बीज, यानी मिनी ट्यूबर तैयार किए जा रहे हैं। कृषि वैज्ञानिकों के अनुसार, फिलहाल यूनिट में आलू की 20 विभिन्न किस्मों के मिनी ट्यूबर विकसित किए जा रहे हैं, जो आगे किसानों को अधिक उत्पादन देने में मदद करेंगे।

टिशू कल्चर से होती है प्रक्रिया की शुरुआत

एरोपोनिक परियोजना की प्रभारी डॉ. सुषमा तिवारी के अनुसार, पूरी प्रक्रिया की शुरुआत टिशू कल्चर तकनीक से होती है। प्रयोगशाला में पहले आलू के पौधे तैयार किए जाते हैं। एरोपोनिक यूनिट में लगाने से करीब एक माह पहले पौधों की हार्डनिंग की जाती है, ताकि वे बाहरी वातावरण के अनुरूप ढल सकें। इसके बाद उन्हें यूनिट में ट्रांसप्लांट किया जाता है। डॉ. तिवारी बताती हैं कि मध्यप्रदेश में इस तरह की पहल पहली बार विश्वविद्यालय द्वारा की गई है, जो राज्य के लिए एक बड़ी उपलब्धि है।

रोग मुक्त और उच्च गुणवत्ता वाला बीज

एरोपोनिक तकनीक से तैयार आलू बीज पूरी तरह रोग मुक्त होते हैं। पौधों को पोषण देने के लिए विशेष फॉगिंग सिस्टम का उपयोग किया जाता है, जिससे जड़ों तक आवश्यक न्यूट्रिएंट्स संतुलित मात्रा में पहुंचते हैं। पारंपरिक खेती में आलू की फसल वायरस और अन्य बीमारियों से प्रभावित हो सकती है, जबकि एरोपोनिक विधि से तैयार मिनी ट्यूबर में ऐसी समस्याएं नहीं होतीं। इसी कारण इनसे उगाई गई फसल अधिक स्वस्थ, बेहतर गुणवत्ता वाली और अधिक उपज देने वाली होती है।

किसानों को मिलेंगे अधिक विकल्प

इस शोध का सीधा लाभ किसानों को मिलेगा। रोग मुक्त और गुणवत्तापूर्ण बीज मिलने से खेती की लागत कम होगी और उत्पादन बढ़ेगा। अभी किसानों के पास आलू की सीमित किस्में उपलब्ध हैं, जबकि विश्वविद्यालय द्वारा 20 अलग-अलग प्रजातियों के बीज विकसित किए जा रहे हैं। डॉ. तिवारी के अनुसार, किसान अपनी जरूरत और बाजार की मांग के अनुसार बीज चुन सकेंगे, जैसे फ्रेंच फ्राई के लिए फ्राइओम और चिप्स के लिए चिपसोना।

एक किलो बीज से 400 किलो उत्पादन

एरोपोनिक तकनीक से बने मिनी ट्यूबर का वजन काफी कम होता है। एक मिनी ट्यूबर का वजन लगभग 2 से 3 ग्राम होता है। डॉ. सुषमा तिवारी के अनुसार, दो साल पहले जब इस तकनीक की शुरुआत डेमोंस्ट्रेशन यूनिट के रूप में की गई थी, तब सिर्फ एक किलो बीज तैयार हुआ था। उसी एक किलो बीज से लगभग 400 किलो सामान्य आलू का उत्पादन किया गया। हालांकि यह बीज सीधे किसानों को नहीं दिया जाता, बल्कि पहले इसे जी-2 प्रक्रिया से गुजरना होता है, ताकि यह खेत में बोने योग्य बन सके। दो साल पहले शुरू हुई प्रक्रिया से तैयार बीज अब किसानों को देने के लिए तैयार है।

तीन चरणों में तैयार होता है बीज

एरोपोनिक तकनीक में बीज किसानों तक पहुंचने से पहले तीन चरणों से गुजरता है। जी-0 चरण में टिशू कल्चर के माध्यम से लैब में पौधों की तैयारी होती है। जी-1 चरण में एरोपोनिक यूनिट में मिनी ट्यूबर विकसित किए जाते हैं और फिर उन्हें नेट हाउस में लगाया जाता है। जी-2 चरण में विश्वविद्यालय के खेतों में इन बीजों की बोवनी कर मिट्टी आधारित बीज तैयार किए जाते हैं, जो किसानों के लिए उपयुक्त होते हैं।

दो साल बाद बड़े स्तर पर उपलब्ध होंगे बीज

डॉ. सुषमा तिवारी का कहना है कि फिलहाल बीज की मात्रा सीमित है, लेकिन दो साल के भीतर बड़ी संख्या में विभिन्न किस्मों के बीज किसानों को उपलब्ध कराए जाएंगे। इससे न केवल मध्यप्रदेश बल्कि अन्य राज्यों के किसान भी लाभ उठा सकेंगे।

पोषक तत्वों की विशेष व्यवस्था

एरोपोनिक यूनिट में पौधों को पर्याप्त पोषण देने के लिए विशेष प्रबंध किए गए हैं। यूनिट में दो अलग-अलग टैंक बनाए गए हैं, जिनमें माइक्रो न्यूट्रिएंट्स मिलाए जाते हैं और उनका इलेक्ट्रिक कंडक्टिविटी स्तर नियंत्रित किया जाता है। बड़े पाइप और फॉगिंग सिस्टम को कंट्रोल पैनल से संचालित किया जाता है। आवश्यकता के अनुसार लगभग 30 सेकंड तक फॉगिंग की जाती है, जिससे पौधों को संतुलित पोषण मिलता है।

किसानों के लिए व्यावसायिक अवसर

एरोपोनिक तकनीक शोध के साथ-साथ किसानों के लिए एक व्यावसायिक विकल्प भी बन सकती है। एक एरोपोनिक यूनिट की लागत लगभग 70 से 75 लाख रुपये होती है। किसान स्वयं यूनिट स्थापित कर उच्च गुणवत्ता का बीज तैयार कर बाजार में बेच सकते हैं। एक बार यूनिट लगाने के बाद इसका उपयोग 5 से 7 वर्षों तक किया जा सकता है। रखरखाव का खर्च कम होता है और मुनाफा अच्छा रहता है। पंजाब और हिमाचल प्रदेश के कुछ किसान पहले से ही इस तकनीक का सफल उपयोग कर रहे हैं।