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डॉलर के सामने रुपया कमजोर 94 पर गिरा, ₹100 पार होने का खतरा

नेशनल डेस्क, श्रेया पाण्डेय 

मुंबई: भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए आज का दिन काफी चिंताजनक रहा। विदेशी मुद्रा बाजार में भारी उथल-पुथल के बीच भारतीय रुपया अमेरिकी डॉलर के मुकाबले ₹94 के अपने अब तक के सबसे निचले स्तर (All-Time Low) पर जा गिरा है। यह गिरावट भारतीय मुद्रा के इतिहास में डॉलर के खिलाफ सबसे तेज ₹5 की गिरावट दर्ज की गई है। बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि यदि वैश्विक आर्थिक संकट और कच्चे तेल की कीमतों में उछाल इसी तरह जारी रहा, तो रुपया जल्द ही ₹100 के मनोवैज्ञानिक स्तर को भी पार कर सकता है।

इस भारी गिरावट का मुख्य कारण पश्चिम एशिया में बढ़ता तनाव और कच्चे तेल की कीमतों का $110 प्रति बैरल के पार पहुंचना बताया जा रहा है। इसके साथ ही, विदेशी संस्थागत निवेशकों (FIIs) द्वारा भारतीय शेयर बाजार से लगातार पैसे निकालने (outflow) ने भी रुपये पर भारी दबाव बनाया है। शुक्रवार के कारोबारी सत्र में रुपया 60 से 80 पैसे तक टूट गया, जिससे आयातकों और आम जनता की चिंताएं बढ़ गई हैं।

रुपये की इस कमजोरी का सीधा असर आम आदमी की जेब पर पड़ेगा। भारत अपनी जरूरत का अधिकांश कच्चा तेल आयात करता है, जिसका भुगतान डॉलर में होता है। रुपया कमजोर होने से तेल का आयात महंगा हो जाएगा, जिससे देश में पेट्रोल-डीजल की कीमतें बढ़ सकती हैं। ईंधन महंगा होने से परिवहन लागत बढ़ेगी, जिसका सीधा असर फल, सब्जी और अन्य जरूरी सामानों की कीमतों पर पड़ेगा, यानी महंगाई में और इजाफा होने की पूरी संभावना है।

इसके अलावा, विदेश में पढ़ाई कर रहे भारतीय छात्रों के लिए भी यह एक बड़ा झटका है, क्योंकि अब उन्हें अपनी फीस और रहने के खर्च के लिए पहले के मुकाबले कहीं ज्यादा रुपये खर्च करने होंगे। साथ ही, इलेक्ट्रॉनिक्स, मोबाइल फोन और ऑटोमोबाइल सेक्टर में भी कीमतों में बढ़ोतरी देखी जा सकती है क्योंकि इन उद्योगों के लिए कच्चे माल और पुर्जों का आयात महंगा हो जाएगा।

भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) स्थिति पर पैनी नजर बनाए हुए है और रुपये को और अधिक गिरने से बचाने के लिए बाजार में हस्तक्षेप कर सकता है। हालांकि, मौजूदा वैश्विक अनिश्चितता और डॉलर की बढ़ती मांग को देखते हुए मुद्रा बाजार में फिलहाल स्थिरता के संकेत कम ही नजर आ रहे हैं। यदि हालात नहीं सुधरे, तो आने वाले महीनों में भारतीय अर्थव्यवस्था को व्यापार घाटे (Trade Deficit) और चालू खाता घाटे (CAD) जैसी गंभीर चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है।