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डॉ. बाबासाहेब अंबेडकर – संविधान के शिल्पकार और अस्पृश्यता के विरुद्ध अमर संघर्ष

मुस्कान कुमारी, नेशनल डेस्क।

विशेष फीचर। “पानी की एक बूंद के विपरीत, जो सागर में मिल जाने पर अपनी पहचान खो देती है, मनुष्य उस समाज में अपना अस्तित्व नहीं खोता जिसमें वह रहता है। मनुष्य का जीवन स्वतंत्र है। वह केवल समाज के विकास के लिए ही नहीं, बल्कि अपने स्वयं के विकास के लिए जन्म लेता है।”

ये शब्द डॉ. भीमराव रामजी अंबेडकर के जीवन-दर्शन को पूरी तरह समेटे हुए हैं। उन्हें बाबासाहेब अंबेडकर के नाम से जाना जाता है। वे भारतीय संविधान के प्रमुख रचनाकार थे, लेकिन इससे कहीं आगे थे। वे एक प्रख्यात राजनीतिक नेता, न्यायविद्, दार्शनिक, अर्थशास्त्री, इतिहासकार, वक्ता, लेखक और संपादक भी थे। अपने पूरे जीवन उन्होंने अस्पृश्यता जैसी सामाजिक बुराई के खिलाफ लड़ाई लड़ी और दलितों तथा पिछड़े वर्गों के अधिकारों के लिए संघर्ष किया। जवाहरलाल नेहरू के मंत्रिमंडल में वे भारत के पहले कानून मंत्री बने। मरणोपरांत 1990 में उन्हें भारत रत्न से सम्मानित किया गया।

प्रारंभिक जीवन और छुआछूत का जहर

14 अप्रैल 1891 को मध्य प्रदेश की महू छावनी में भीमराव अंबेडकर का जन्म हुआ। वे अपने माता-पिता की चौदहवीं संतान थे। उनके पिता रामजी मालोजी सकपाल भारतीय सेना में सूबेदार थे। परिवार हिंदू महार जाति से था, जिसे उस समय उच्च वर्ग “अछूत” मानता था।

बचपन से ही भीमराव को हर जगह घोर भेदभाव का सामना करना पड़ा। ब्रिटिश सरकार के आर्मी स्कूल में भी उन्हें अपमान सहना पड़ा। भेदभाव उनका पीछा कहीं नहीं छोड़ता था। फिर भी उन्होंने हार नहीं मानी। 1908 में वे मुंबई के एल्फिंस्टन कॉलेज में दाखिला लेने गए। बड़ौदा के गायकवाड़ शासक सयाजी राव तृतीय ने उन्हें 25 रुपये मासिक छात्रवृत्ति दी। 1912 में बॉम्बे विश्वविद्यालय से उन्होंने राजनीति विज्ञान और अर्थशास्त्र में स्नातक की उपाधि प्राप्त की। उच्च शिक्षा के लिए वे अमेरिका चले गए।

न्याय के लिए संघर्ष और विदेशी डिग्रियाँ

अमेरिका से लौटने के बाद अंबेडकर को बड़ौदा के राजा का रक्षा सचिव नियुक्त किया गया। लेकिन वहाँ भी ‘अछूत’ होने के कारण उन्हें अपमान सहना पड़ा। फिर भी उन्होंने हिम्मत नहीं हारी। 1920 में वे अपने खर्च पर इंग्लैंड चले गए। लंदन विश्वविद्यालय से उन्हें डी.एससी. की उपाधि मिली। 8 जून 1927 को कोलंबिया विश्वविद्यालय ने उन्हें डॉक्टरेट की उपाधि प्रदान की।

भारत लौटकर उन्होंने देखा कि जातिगत भेदभाव देश को टुकड़ों में बाँट रहा है। उन्होंने इसके खिलाफ मोर्चा खोल दिया। वे दलितों और पिछड़े वर्गों के लिए आरक्षण के प्रबल समर्थक थे। जनता तक अपनी बात पहुँचाने के लिए उन्होंने “मूकनायक” नामक समाचार पत्र शुरू किया। एक रैली में उनके भाषण के बाद कोल्हापुर के शासक शाहू चतुर्थ ने उनके साथ भोजन किया। इस घटना ने पूरे देश में हलचल मचा दी।

संविधान सभा, कानून मंत्री और अंतिम यात्रा

डॉ. अंबेडकर का दृढ़ विश्वास था कि शिक्षा हर वर्ग तक पहुँचनी चाहिए। उन्होंने शिक्षा को सामाजिक परिवर्तन का सबसे बड़ा हथियार माना। 1954-55 से वे मधुमेह और कमजोर दृष्टि जैसी गंभीर बीमारियों से जूझ रहे थे। 6 दिसंबर 1956 को दिल्ली स्थित अपने घर में उनका निधन हो गया।

उनकी मृत्यु के बाद भी उनकी विरासत जीवित रही। 26 अगस्त 1982 को आंध्र प्रदेश राज्य विधानमंडल के अधिनियम द्वारा डॉ. बी.आर. अंबेडकर मुक्त विश्वविद्यालय की स्थापना की गई। प्रसिद्ध निर्देशक जब्बार पटेल ने उनके जीवन पर अंग्रेजी फिल्म बनाई, जिसे बाद में हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं में डब किया गया।

डॉ. अंबेडकर का नाम आज दलितों और शोषितों की विजय का प्रतीक बन चुका है। उन्होंने न सिर्फ संविधान लिखा, बल्कि लाखों लोगों को आत्मसम्मान और अधिकार दिलाए। वे कभी सिर्फ एक नेता नहीं थे। वे एक विचार थे, एक आंदोलन थे, एक उम्मीद थे।