नेशनल डेस्क, आर्या कुमारी।
कोलकाता, पश्चिम बंगाल की राजनीति में बुधवार को एक बड़ा घटनाक्रम सामने आया, जब तृणमूल कांग्रेस के भीतर बढ़ते असंतोष ने खुलकर नया मोड़ ले लिया। पार्टी से निष्कासित विधायक ऋतब्रत बंदोपाध्याय के नेतृत्व वाले 58 विधायकों के समूह को विधानसभा अध्यक्ष ने आधिकारिक तौर पर सदन में मुख्य विपक्षी दल के रूप में मान्यता प्रदान कर दी। इसके साथ ही ऋतब्रत बंदोपाध्याय को विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष का दर्जा भी मिल गया है, जिससे राज्य की राजनीतिक परिस्थितियों में महत्वपूर्ण बदलाव देखने को मिल रहा है।
हाल ही में संपन्न विधानसभा चुनाव में तृणमूल कांग्रेस को अपेक्षा से कहीं अधिक नुकसान उठाना पड़ा था। 294 सदस्यीय विधानसभा में पार्टी की सीटें घटकर केवल 80 रह गईं, जिसके बाद संगठन के भीतर असंतोष और नेतृत्व को लेकर सवाल उठने लगे थे। चुनावी पराजय के बाद पार्टी में मतभेद लगातार गहराते गए और अंततः इसका असर विधायक दल में स्पष्ट रूप से दिखाई देने लगा। राजनीतिक पर्यवेक्षकों का मानना है कि यह घटनाक्रम तृणमूल कांग्रेस के लिए एक गंभीर संगठनात्मक चुनौती बनकर उभरा है।
बुधवार को ऋतब्रत बंदोपाध्याय के नेतृत्व में बड़ी संख्या में विधायकों ने विधानसभा अध्यक्ष से मुलाकात कर अपने समूह को वास्तविक तृणमूल विधायक दल होने का दावा पेश किया। इस दौरान 58 विधायकों के हस्ताक्षरयुक्त समर्थन पत्र भी सौंपे गए। साथ ही सदन में नई नेतृत्व संरचना का प्रस्ताव प्रस्तुत करते हुए ऋतब्रत बंदोपाध्याय को विधायक दल का नेता चुने जाने की जानकारी दी गई। समूह ने जावेद खान, संदीपन साहा और शिउली साहा को उपनेता तथा अखरुज्जमान को मुख्य सचेतक नियुक्त करने का प्रस्ताव भी विधानसभा अध्यक्ष के समक्ष रखा।
विधानसभा अध्यक्ष से मिलने से पहले इस गुट के विधायकों ने विधानसभा परिसर में एक अलग बैठक आयोजित की, जिसमें संगठन की भावी रणनीति और सदन के भीतर भूमिका को लेकर चर्चा की गई। उल्लेखनीय है कि इस बैठक में शामिल अधिकांश विधायक पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी द्वारा आयोजित हालिया विरोध कार्यक्रम से दूरी बनाए हुए थे। इससे यह संकेत मिला कि पार्टी के भीतर नेतृत्व को लेकर असहमति अब सार्वजनिक रूप से सामने आ चुकी है और दोनों पक्षों के बीच राजनीतिक दूरी लगातार बढ़ रही है।
दूसरी ओर, तृणमूल कांग्रेस के कई वरिष्ठ और प्रभावशाली नेता इस बैठक में शामिल नहीं हुए। लंबे समय से पार्टी नेतृत्व के करीबी माने जाने वाले कुछ प्रमुख चेहरे ऋतब्रत गुट की गतिविधियों से अलग रहे। इससे साफ है कि पार्टी के भीतर फिलहाल दो अलग-अलग ध्रुव बनते दिखाई दे रहे हैं। हालांकि दोनों पक्ष अपने-अपने समर्थकों के दम पर संगठन में प्रभाव बनाए रखने का प्रयास कर रहे हैं, लेकिन मौजूदा घटनाक्रम ने राजनीतिक समीकरणों को पूरी तरह बदल दिया है।
इस पूरे मामले में दलबदल विरोधी कानून की भूमिका भी महत्वपूर्ण मानी जा रही है। नियमों के अनुसार किसी भी अलग गुट को अपनी सदस्यता सुरक्षित रखने के लिए मूल विधायक दल के कम से कम दो-तिहाई सदस्यों का समर्थन प्राप्त होना आवश्यक होता है। चूंकि तृणमूल कांग्रेस के पास वर्तमान में 80 विधायक हैं, इसलिए यह संख्या 54 विधायकों पर आकर ठहरती है। ऋतब्रत बंदोपाध्याय के साथ 58 विधायकों का समर्थन होने के कारण उनका गुट इस कानूनी सीमा को पार करता दिखाई देता है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इसी वजह से विधानसभा अध्यक्ष द्वारा इस समूह को मान्यता देने के फैसले को कानूनी चुनौती देना आसान नहीं होगा। पर्याप्त संख्या बल होने के कारण ऋतब्रत गुट को दलबदल विरोधी प्रावधानों के तहत संरक्षण मिलने की संभावना मजबूत मानी जा रही है। ऐसे में पश्चिम बंगाल की राजनीति में यह घटनाक्रम आने वाले दिनों में सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों के लिए नए राजनीतिक समीकरण तैयार कर सकता है।







