नेशनल डेस्क, आर्या कुमारी।
नई दिल्ली, उच्चतम न्यायालय ने मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) की वैधता को बरकरार रखते हुए कहा है कि स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव सुनिश्चित करने के लिए इस तरह की प्रक्रिया आवश्यक है। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि चुनावी व्यवस्था की विश्वसनीयता केवल मतदान तक सीमित नहीं होती, बल्कि उसकी नींव सटीक और अद्यतन मतदाता सूची पर आधारित होती है। अदालत ने माना कि चुनाव आयोग को कानून के तहत ऐसे पुनरीक्षण कराने का अधिकार प्राप्त है।
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची की पीठ ने उन याचिकाओं पर फैसला सुनाया, जिनमें बिहार में पिछले वर्ष जून में शुरू की गई मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण संबंधी अधिसूचना को चुनौती दी गई थी। याचिकाकर्ताओं का तर्क था कि यह प्रक्रिया नियमित पुनरीक्षण के स्थापित नियमों और प्रक्रियाओं से अलग है, लेकिन अदालत ने इस दलील को स्वीकार नहीं किया।
फैसले में कहा गया कि संविधान के अनुच्छेद 324, जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 और उसके अंतर्गत बनाए गए नियम चुनाव आयोग को किसी भी समय विशेष पुनरीक्षण कराने की शक्ति प्रदान करते हैं। न्यायालय ने कहा कि केवल इस आधार पर एसआईआर को अवैध नहीं माना जा सकता कि इसमें नियमित पुनरीक्षण की प्रत्येक प्रक्रिया का पूर्ण रूप से पालन नहीं किया गया। अदालत के अनुसार, यदि कानून आयोग को विशेष परिस्थितियों में पुनरीक्षण का अधिकार देता है, तो उस अधिकार के उपयोग को असंवैधानिक नहीं कहा जा सकता।
शीर्ष अदालत ने अपने निर्णय में कहा कि विवादित एसआईआर जन प्रतिनिधित्व अधिनियम और उससे जुड़े नियमों का विकल्प नहीं है, बल्कि यह कानून द्वारा निर्धारित सीमाओं के भीतर चुनाव आयोग के संवैधानिक दायित्वों को प्रभावी बनाने का माध्यम है। न्यायालय ने माना कि आयोग ने अपनी कानूनी शक्तियों का अतिक्रमण नहीं किया और उपलब्ध संवैधानिक अधिकारों के दायरे में रहकर कार्य किया है।
अदालत ने यह भी कहा कि स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव केवल मतदान की प्रक्रिया से नहीं जुड़े हैं, बल्कि मतदाता सूची की शुद्धता और विश्वसनीयता लोकतांत्रिक व्यवस्था की आधारशिला है। यदि मतदाता सूची सटीक नहीं होगी, तो चुनावी प्रक्रिया की निष्पक्षता भी प्रभावित हो सकती है। इसी कारण विशेष पुनरीक्षण जैसी प्रक्रियाएं लोकतंत्र को मजबूत बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।
फैसले में यह स्पष्ट किया गया कि जन प्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा 16 के तहत चुनाव आयोग को मतदाता सूची तैयार करने या उसमें संशोधन करने के दौरान नागरिकता से जुड़े प्रश्नों की जांच करने का अधिकार है। हालांकि न्यायालय ने कहा कि ऐसी जांच केवल मतदाता सूची में नाम जोड़ने या हटाने जैसे चुनावी उद्देश्यों तक सीमित रहनी चाहिए और पहले से पंजीकृत मतदाताओं के अधिकारों तथा उनके पक्ष में लागू पूर्वधारणाओं का सम्मान किया जाना आवश्यक है।
उच्चतम न्यायालय ने कहा कि चुनाव आयोग उपलब्ध चुनावी सामग्रियों और तथ्यों के आधार पर निर्णय ले सकता है, लेकिन यह प्रक्रिया केवल चुनावी प्रयोजनों तक सीमित रहेगी। अदालत के फैसले को मतदाता सूची की पारदर्शिता और चुनावी प्रणाली की विश्वसनीयता को मजबूत करने की दिशा में महत्वपूर्ण माना जा रहा है।







