स्टेट डेस्क, आकाश अस्थाना।
नई दिल्ली: श्री लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय, नई दिल्ली एवं दिल्ली संस्कृत अकादमी के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित अंतरराष्ट्रीय पुरोहित सम्मेलन का उद्घाटन सत्र शनिवार को विश्वविद्यालय परिसर में वैदिक मंगलाचार, मंत्रोच्चार एवं गरिमामय वातावरण के मध्य संपन्न हुआ।
सम्मेलन में देश-विदेश से आए विद्वानों, आचार्यों, पुरोहितों, शोधार्थियों एवं संस्कृत-सेवियों ने सहभागिता करते हुए भारतीय पुरोहित परंपरा के संरक्षण, संवर्धन तथा शोधपरक विकास पर व्यापक विचार-विमर्श किया।इस अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन का आयोजन सामान्य पूजन, विशिष्ट पूजन, अनुष्ठानिक पूजन, यज्ञ-पूजन, पाठाधि-पूजन तथा अन्य वैदिक संस्कारों को केंद्र में रखकर शोधपरक दृष्टि से किया गया है। सम्मेलन का उद्देश्य भारतीय पुरोहित परंपरा के शास्त्रीय, सांस्कृतिक, दार्शनिक एवं वैज्ञानिक पक्षों का अकादमिक अध्ययन करते हुए उसकी समकालीन प्रासंगिकता तथा वैश्विक उपयोगिता को स्थापित करना है।सम्मेलन की अध्यक्षता विश्वविद्यालय के कुलपति प्रोफेसर मुरलीमनोहर पाठक ने की। अपने विस्तृत अध्यक्षीय उद्बोधन में उन्होंने कहा कि भारतीय पुरोहित परंपरा केवल धार्मिक अनुष्ठानों के संपादन तक सीमित नहीं है, बल्कि यह भारत की सनातन ज्ञान-परंपरा, सांस्कृतिक चेतना, आध्यात्मिक जीवन-दर्शन तथा सामाजिक उत्तरदायित्व का जीवंत आधार है। उन्होंने कहा कि वेद, ब्राह्मण, आरण्यक, उपनिषद्, स्मृतियों एवं पुराणों में वर्णित संस्कार-परंपरा मानव जीवन को संस्कारित, अनुशासित और लोकमंगल की भावना से अनुप्राणित करती है। पुरोहित समाज इसी महान परंपरा का संवाहक एवं संरक्षक है।प्रोफेसर पाठक ने कहा कि वर्तमान समय में आवश्यकता केवल कर्मकाण्डों के निर्वहन की नहीं, बल्कि पुरोहितों को शास्त्रसम्मत ज्ञान, शोध-दृष्टि, आधुनिक प्रशिक्षण एवं सामाजिक उत्तरदायित्व से भी संपन्न बनाने की है। सामान्य पूजन, विशिष्ट पूजन, अनुष्ठानिक पूजन, यज्ञ-पूजन, पाठाधि-पूजन तथा विविध वैदिक संस्कारों का व्यवस्थित अध्ययन, प्रलेखन एवं वैज्ञानिक विश्लेषण समय की महती आवश्यकता है।उन्होंने कहा कि भारतीय ज्ञान-परंपरा का वैश्विक प्रभाव तभी और अधिक सुदृढ़ होगा, जब पुरोहित शिक्षा को अनुसंधान, आधुनिक तकनीक, व्यवहारिक प्रशिक्षण तथा अंतरराष्ट्रीय संवाद से जोड़ा जाएगा।
श्री लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय भारतीय ज्ञान-परंपरा के संरक्षण एवं संवर्धन के लिए निरंतर प्रतिबद्ध है। विश्वविद्यालय पुरोहित शिक्षा, वैदिक अध्ययन तथा संस्कृत के विविध आयामों को आधुनिक संदर्भों से जोड़ते हुए नई शैक्षिक एवं शोधपरक संभावनाओं का विकास कर रहा है। उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि यह अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन भारतीय पुरोहित परंपरा को वैश्विक पहचान प्रदान करने तथा संस्कृत एवं वैदिक संस्कृति के प्रचार-प्रसार में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाएगा।विशिष्ट अतिथि पूज्या साध्वी श्री विभानंद गिरि जी महाराज ने अपने उद्बोधन में कहा कि भारतीय संस्कृति की आत्मा वैदिक परंपरा एवं सनातन संस्कारों में निहित है। पुरोहित समाज इस महान सांस्कृतिक धरोहर का वास्तविक संरक्षक है। उन्होंने युवाओं को संस्कृत, वेद एवं भारतीय जीवन-मूल्यों से जोड़ने का आह्वान किया।मुख्य अतिथि श्री जयप्रकाश जी, अखिल भारतीय संगठन मंत्री, संस्कृत भारती ने कहा कि संस्कृत भाषा और पुरोहित परंपरा एक-दूसरे की पूरक हैं। संस्कृत के व्यापक प्रचार-प्रसार के लिए विद्वान, प्रशिक्षित एवं संस्कारित पुरोहितों का निर्माण अत्यंत आवश्यक है। उन्होंने वैदिक परंपरा के वैज्ञानिक एवं सांस्कृतिक स्वरूप को समाज के समक्ष प्रभावी ढंग से प्रस्तुत करने पर बल दिया।विशिष्ट अतिथि प्रोफेसर देवी प्रसाद त्रिपाठी ने भारतीय पुरोहित परंपरा के दार्शनिक एवं सांस्कृतिक आयामों का विवेचन करते हुए कहा कि पुरोहित केवल कर्मकाण्ड का अनुष्ठाता नहीं, बल्कि समाज का सांस्कृतिक मार्गदर्शक, नैतिक प्रेरक एवं आध्यात्मिक शिक्षक भी है।सारस्वत अतिथि प्रोफेसर संतोष कुमार शुक्ला एवं प्रोफेसर वृंदावन दास ने वैदिक साहित्य, कर्मकाण्डीय परंपरा एवं पुरोहित शिक्षा के विविध पक्षों पर विचार व्यक्त करते हुए कहा कि पुरोहितीय परंपरा का व्यवस्थित शोध, प्रलेखन एवं अकादमिक अध्ययन वर्तमान समय की आवश्यकता है।पुरोहित विभागाध्यक्ष प्रोफेसर रामराज उपाध्याय ने विषय-प्रवर्तन करते हुए सम्मेलन की रूपरेखा एवं उद्देश्यों पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि सम्मेलन का उद्देश्य सामान्य पूजन, विशिष्ट पूजन, अनुष्ठानिक पूजन, यज्ञ-पूजन, पाठाधि-पूजन तथा वैदिक संस्कारों की परंपरा का शास्त्रीय एवं शोधपरक अध्ययन करना है, जिससे पुरोहित शिक्षा को समकालीन आवश्यकताओं के अनुरूप विकसित किया जा सके।अंतरराष्ट्रीय सत्र में श्री अमीचंद महाराज, अध्यक्ष, श्री सनातन धर्म युवक पुरोहित मंडल एवं हिंदू पृष्ठ संगठन, डरबन (दक्षिण अफ्रीका) ने प्रवासी भारतीय समाज में वैदिक संस्कारों के संरक्षण में पुरोहितों की भूमिका पर अपने विचार व्यक्त किए। संयुक्त राज्य अमेरिका से श्री शिवराम पोडेल ऑनलाइन माध्यम से सम्मेलन में वक्ता के रूप में जुड़े और भारतीय वैदिक संस्कृति की वैश्विक स्वीकार्यता तथा प्रशिक्षित पुरोहितों की आवश्यकता पर अपने विचार रखे।उद्घाटन सत्र के समापन पर विश्वविद्यालय के कुलसचिव प्रोफेसर पवन कुमार शर्मा ने धन्यवाद ज्ञापन प्रस्तुत किया। उन्होंने सम्मेलन की सफलता के लिए सभी विशिष्ट अतिथियों, विद्वानों, शोधार्थियों, प्रतिभागियों एवं आयोजकों के प्रति हार्दिक आभार व्यक्त किया।
उन्होंने कहा कि श्री लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय एवं दिल्ली संस्कृत अकादमी का यह संयुक्त आयोजन भारतीय पुरोहित परंपरा के संरक्षण, संवर्धन एवं अकादमिक सुदृढ़ीकरण की दिशा में एक महत्त्वपूर्ण पहल है।प्रोफेसर शर्मा ने कुलपति प्रोफेसर मुरलीमनोहर पाठक के दूरदर्शी नेतृत्व एवं मार्गदर्शन के प्रति विशेष कृतज्ञता व्यक्त करते हुए कहा कि उनके नेतृत्व में विश्वविद्यालय भारतीय ज्ञान-परंपरा, संस्कृत अध्ययन एवं पुरोहित शिक्षा के क्षेत्र में निरंतर नए प्रतिमान स्थापित कर रहा है। उन्होंने सभी अतिथियों के प्रेरणादायी उद्बोधनों को सम्मेलन की अमूल्य धरोहर बताते हुए कहा कि इन विचारों से भविष्य के शोध एवं प्रशिक्षण कार्यक्रमों को नई दिशा मिलेगी।उन्होंने दिल्ली संस्कृत अकादमी, विश्वविद्यालय परिवार, आयोजन समिति, पुरोहित विभाग, समस्त शिक्षकों, अधिकारियों, कर्मचारियों, शोधार्थियों, स्वयंसेवकों तथा देश-विदेश से प्रत्यक्ष एवं ऑनलाइन जुड़े सभी प्रतिभागियों के प्रति आभार व्यक्त किया। उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि सम्मेलन से प्राप्त निष्कर्ष भारतीय पुरोहित परंपरा, संस्कृत भाषा एवं वैदिक संस्कृति के संरक्षण तथा वैश्विक प्रचार-प्रसार में मील का पत्थर सिद्ध होंगे।सम्मेलन के सफल आयोजन में आयोजन समिति की महत्त्वपूर्ण भूमिका रही। कार्यक्रम संयोजक एवं पुरोहित विभागाध्यक्ष प्रोफेसर रामराज उपाध्याय के कुशल नेतृत्व में सम्मेलन की समस्त व्यवस्थाएँ संपन्न हुईं। सहसंयोजक के रूप में प्रोफेसर वृंदावन दास ने सक्रिय सहयोग प्रदान किया। आयोजन सचिव डॉ. मधुसूदन शर्मा, समन्वयक डॉ. रविंद्र पांडा तथा सह-समन्वयक डॉ. नीतेश झा ने अपने-अपने दायित्वों का कुशलतापूर्वक निर्वहन करते हुए सम्मेलन को सफल बनाने में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया।उद्घाटन सत्र का प्रभावी संचालन प्रोफेसर सुंदर नारायण झा ने किया। सम्मेलन में उपस्थित विद्वानों ने एक स्वर से कहा कि भारतीय पुरोहित परंपरा केवल धार्मिक आस्था का विषय नहीं, बल्कि भारतीय ज्ञान-परंपरा, सांस्कृतिक विरासत, सामाजिक समरसता एवं वैश्विक मानव कल्याण की आधारशिला है। सम्मेलन ने इस दिशा में शोध, प्रशिक्षण एवं अंतरराष्ट्रीय सहयोग के नए आयाम स्थापित करने का मार्ग प्रशस्त किया।






