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प्रोसेस्ड फूड्स से गट डाइवर्सिटी 30% कम: फोर्टिस डॉक्टर का खुलासा

हेल्थ डेस्क, मुस्कान कुमारी।

नई दिल्ली । प्रोसेस्ड फूड्स का ज्यादा सेवन गट माइक्रोबायोम की विविधता को 30 प्रतिशत तक घटा सकता है। फोर्टिस हॉस्पिटल, शालीमार बाग के सीनियर डायरेक्टर एंड एचओडी गैस्ट्रोएंटरोलॉजी डॉ. रमेश गर्ग ने चेतावनी देते हुए कहा कि भारतीय पारंपरिक भोजन इससे कहीं बेहतर विकल्प है।

प्रोसेस्ड बनाम प्राकृतिक भोजन: गट पर क्या असर
  
नेचर मेडिसिन में प्रकाशित हालिया अध्ययन में खुलासा हुआ है कि पैकेट वाले स्नैक्स, इंस्टेंट नूडल्स और शुगर युक्त ड्रिंक्स जैसी अल्ट्रा-प्रोसेस्ड चीजें फाइबर की कमी और एडिटिव्स के कारण अच्छे बैक्टीरिया को नुकसान पहुंचाती हैं। इससे सूजन बढ़ती है और मेटाबॉलिक बीमारियां होने का खतरा बढ़ जाता है।  

डॉ. गर्ग ने स्पष्ट किया, “हाईली प्रोसेस्ड फूड्स गट माइक्रोबायोम को बिगाड़ते हैं। वे फायदेमंद बैक्टीरिया कम करते हैं और हानिकारक स्ट्रेन्स को बढ़ावा देते हैं। लंबे समय में यह सूजन और मेटाबॉलिक डिसऑर्डर का कारण बनता है।”  

एक डाइट सबके लिए नहीं, माइक्रोबायोम हर व्यक्ति का अलग  

अध्ययन में यह भी सामने आया कि कोई एक डाइट हर किसी के लिए काम नहीं करती। गट बैक्टीरिया हर इंसान में जेनेटिक्स, पर्यावरण और लाइफस्टाइल के आधार पर अलग-अलग होते हैं। डॉ. गर्ग ने कहा, “हर व्यक्ति का गट माइक्रोबायोम यूनिक है। एक ही डाइट दो लोगों पर अलग-अलग असर कर सकती है।”  

इस वजह से वेट लॉस या मेटाबॉलिक हेल्थ के लिए पर्सनलाइज्ड न्यूट्रिशन की जरूरत बढ़ रही है।  

फैड डाइट्स का खतरा, भारतीय भोजन का फायदा
 
जूस फास्ट या लिक्विड डाइट जैसी क्विक-फिक्स योजनाएं लंबे समय में गट डाइवर्सिटी और कम कर सकती हैं। डॉ. गर्ग ने सलाह दी कि शॉर्ट-टर्म फिक्स से बचें।  

दूसरी ओर, भारतीय घरेलू खाना प्राकृतिक रूप से गट-फ्रेंडली है। दही में प्रोबायोटिक्स, इडली-डोसा-कांजी जैसे फर्मेंटेड फूड्स, दाल- सब्जियां और घर के अचार माइक्रोबायोम को बूस्ट करते हैं। डॉ. गर्ग ने जोड़ा, “पारंपरिक भारतीय भोजन प्राकृतिक माइक्रोबायोम बूस्टर हैं। ये डाइजेशन, इम्युनिटी और मेटाबॉलिक हेल्थ को सपोर्ट करते हैं।”  

मील रिप्लेसमेंट और लिक्विड डाइट पर सावधानी

प्रोटीन शेक या मील रिप्लेसमेंट का बार-बार इस्तेमाल भी गट डाइवर्सिटी पर बुरा असर डाल सकता है। डॉ. गर्ग ने कहा, “ये कभी-कभी ठीक हैं लेकिन पूरे खाने की जगह नहीं ले सकते।”  

अध्ययन के मुताबिक भविष्य में स्टूल और ब्लड टेस्ट के आधार पर पर्सनलाइज्ड डाइट प्लान बनाए जा सकेंगे, लेकिन अभी सस्टेनेबल और कम प्रोसेस्ड खाना ही सबसे सुरक्षित रास्ता है।