लोकल डेस्क, ऋषि राज।
रक्सौल: आज की युवा पीढ़ी का दर्द अत्यंत ही गहरा है।अपनी महत्वाकांक्षाओं और अपनों की अपेक्षाओं के बोझ तले उनका अस्तित्व चरमरा रहा है।
उक्त विचार लायंस क्लब ऑफ रक्सौल के अध्यक्ष सह मीडिया प्रभारी एवं भारत विकास परिषद् , रक्सौल के सेवा संयोजक सह मीडिया प्रभारी सह सामाजिक कार्यकर्ता बिमल सर्राफ ने प्रेस से साझा किया।उनमें कुछ खास करने की चाहत है,वे कुछ खास बनना चाहते हैं,पर किस तरह उन्हें पता नहीं।उन्हें कोई बताने वाला, राह दिखाने वाला नहीं मिलता। माँ-बाप,अपने बेटे को,बेटी को आसमान की बुलंदियों पर देखना चाहते हैं,लेकिन बेटे या बेटी के दिल का हाल जानने के लिए उनके पास वक्त नहीं है।उनके लिए प्रथम पढ़ाई या अन्य खर्चों के लिए धन जुटा देना,यही उनके लिए सब कुछ है।समय-समय पर उन्हें चेताते और जताते भी रहते हैं कि मैंने तुम्हारे लिए क्या-क्या नहीं किया।तुम्हारे लिए क्या सुविधाएँ और सहूलियतें जुटाईं।उनकी इन बातों के बोझ से उनके लाडले अथवा लाडली का मन कितना दबा जा रहा है,इसकी उन्हें खबर भी नहीं होगी।प्रायः यह देखा जाता है कि आज की युवा पीढ़ी अपनी दिशा एवं विषयों के चयन में माता-पिता की इच्छा के आगे समर्पण कर देती है।
बहुत कम ही माता-पिता ऐसे होते हैं,जो बेटे और बेटी की रुचि अथवा उसकी आंतरिक संभावनाओं का ख्याल रखते हैं।प्रायः इस संबंध में अभिभावकों की दमित आकांक्षाएं ही उजागर होती हैं।यहीं से शुरू होता है बेमेल जीवन का दर्द।रुचि,प्रकृति एवं संभावनाओं के विपरीत पढ़ाई का चयन युवाओं में कुंठा को जन्म देता है।मन की पढ़ाई का चयन ना होने से स्वाभाविक ही उन्हें कम अंक मिलते हैं,तब अभिभावक की उन्हें डांट एवं उलाहना सुनने को मिलती।कभी-कभी तो स्थिति यह बनती है कि युवा पीढ़ी के मन में अपने अभिभावकों के प्रति गहरा डर समा जाता है।
साथ ही उनके मन में गहरी होती जाती है निराशा और चिंता।कहीं किसी कोने में बनती है गाँठ अपराध-बोध की। इस अवस्था में युवा भावनात्मक रूप से अपने को बहुत अकेला पाते हैं। सारांश ये है कि सभी माता-पिता अपने बच्चों की परवरिश तो अच्छा से अच्छा करते हैं मगर बच्चों की रुचि जाने बिना ही अपनी मर्जी को थोपना चाहते हैं पढ़ाई में, सो सभी माता-पिता ध्यान रखें बच्चों की रुचि पढ़ाई में क्या है साथ ही उनसे समय समय पर संवाद करते रहें जिससे बच्चों में आत्मबल की वृद्धि हो।







