नेशनल डेस्क, मुस्कान सिंह।
नई दिल्ली: राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने कहा है कि भारत आने वाले 20 से 30 वर्षों में विश्व मंच पर एक सशक्त और प्रभावशाली राष्ट्र के रूप में उभरेगा। उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि भारत का विश्वगुरु बनना तय है, लेकिन उसका स्वरूप अमेरिका या चीन जैसी महाशक्तियों से अलग होगा। भारत अपनी सांस्कृतिक विरासत, आध्यात्मिक मूल्यों और मानवीय दृष्टिकोण के आधार पर दुनिया को नई दिशा देने का कार्य करेगा।
नई दिल्ली में आयोजित बीएमएल मुंजाल पुरस्कार समारोह को संबोधित करते हुए डॉ. भागवत ने कहा कि वर्तमान समय में दुनिया अनेक संकटों और चुनौतियों से गुजर रही है। विभिन्न देशों के बीच बढ़ते तनाव, युद्ध, आर्थिक अस्थिरता और सामाजिक विघटन जैसी समस्याएं वैश्विक चिंता का विषय बनी हुई हैं। ऐसे समय में विश्व की निगाहें भारत की ओर हैं, क्योंकि भारत के पास ऐसी सांस्कृतिक और दार्शनिक परंपरा है जो मानवता को संतुलन और शांति का मार्ग दिखा सकती है।
उन्होंने कहा कि भारत का भविष्य केवल आर्थिक और तकनीकी विकास तक सीमित नहीं है, बल्कि यह राष्ट्र अपने नैतिक मूल्यों, सामाजिक समरसता और आध्यात्मिक चेतना के कारण भी विशेष पहचान रखता है। भारत की सभ्यता हजारों वर्षों पुरानी है और उसने हमेशा “वसुधैव कुटुम्बकम्” तथा मानव कल्याण की भावना को प्राथमिकता दी है। यही विचार आज की दुनिया के लिए सबसे अधिक प्रासंगिक हैं।
डॉ. भागवत ने कहा कि दुनिया के कई देशों ने विज्ञान, तकनीक और आर्थिक क्षेत्र में उल्लेखनीय उपलब्धियां हासिल की हैं और मानव समाज को बहुत कुछ दिया है। इसके बावजूद विश्व में संघर्ष, असमानता और अस्थिरता जैसी समस्याएं बनी हुई हैं। उन्होंने कहा कि केवल भौतिक विकास से इन समस्याओं का समाधान संभव नहीं है। इसके लिए मानवीय मूल्यों, नैतिकता और आध्यात्मिक दृष्टिकोण की आवश्यकता है, जो भारत की सबसे बड़ी ताकत है।
उन्होंने अपने संबोधन में भारत के निर्माण, उसके मूल्यों और भविष्य की भूमिका पर विस्तार से चर्चा की। उन्होंने कहा कि देश के युवाओं को अपनी संस्कृति, परंपराओं और मूल्यों को समझते हुए आधुनिकता के साथ आगे बढ़ना चाहिए। भारत का विकास तभी सार्थक होगा जब वह अपनी जड़ों से जुड़ा रहेगा और समाज के सभी वर्गों को साथ लेकर आगे बढ़ेगा। भारत के पास ऐसा ज्ञान और दर्शन है जिसकी आवश्यकता आज पूरी दुनिया को है। भारतीय चिंतन केवल अपने लिए नहीं, बल्कि संपूर्ण मानवता के कल्याण की बात करता है। यही कारण है कि विश्व समुदाय भारत को आशा और समाधान के केंद्र के रूप में देख रहा है।
आने वाले वर्षों में भारत शिक्षा, विज्ञान, प्रौद्योगिकी, अर्थव्यवस्था और सामाजिक विकास के क्षेत्रों में नई ऊंचाइयों को प्राप्त करेगा। साथ ही अपनी सांस्कृतिक पहचान और आध्यात्मिक मूल्यों के माध्यम से वैश्विक स्तर पर नेतृत्वकारी भूमिका निभाएगा। डॉ. भागवत ने कहा कि भारत का विश्वगुरु बनना किसी प्रभुत्व की भावना नहीं, बल्कि मानवता के हित में ज्ञान, शांति और सहयोग का संदेश देने की प्रक्रिया होगी। aयदि देश अपने मूल्यों को बनाए रखते हुए निरंतर प्रगति करता रहा, तो आने वाले दो से तीन दशकों में भारत न केवल एक महाशक्ति बनेगा, बल्कि विश्व को नई दिशा देने वाला राष्ट्र भी बनेगा। भारत की यही विशेषता उसे अन्य वैश्विक शक्तियों से अलग पहचान दिलाएगी।







