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मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने धार की भोजशाला को घोषित किया 'वाग्देवी मंदिर', नमाज की अनुमति वाला 2003 का एएसआई आदेश निरस्त

नेशनल डेस्क, श्रेया पाण्डेय 

मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय की इंदौर खंडपीठ ने धार जिले में स्थित सदियों पुराने ऐतिहासिक और विवादित भोजशाला परिसर को लेकर एक युगांतकारी निर्णय सुनाया है। न्यायालय ने विभिन्न पक्षों की ओर से दायर याचिकाओं का निपटारा करते हुए स्पष्ट रूप से इसे वाग्देवी (मां सरस्वती) का मंदिर घोषित कर दिया है।

न्यायमूर्ति विनय कुमार शुक्ला और न्यायमूर्ति आलोक अवस्थी की पीठ ने इस संवेदनशील मामले में हिंदू और मुस्लिम दोनों पक्षों की दलीलें सुनने तथा भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) द्वारा सौंपे गए वैज्ञानिक सर्वे की रिपोर्ट का गहन अध्ययन करने के बाद शुक्रवार, 15 मई 2026 को यह बड़ा फैसला सुरक्षित रखा था, जिसे अब सार्वजनिक किया गया है। उच्च न्यायालय ने अपने 242 पन्नों के विस्तृत आदेश में कहा कि ऐतिहासिक साहित्यिक साक्ष्य और पुरातात्विक संरचना यह पूरी तरह सिद्ध करते हैं कि यह परिसर मूल रूप से परमार राजवंश के राजा भोज द्वारा स्थापित 11वीं सदी का एक भव्य संस्कृत शिक्षण केंद्र और मां सरस्वती का मंदिर था।

कोर्ट ने कहा कि समय के साथ इसके स्वरूप में किए गए बदलावों से इस स्थान का मूल धार्मिक चरित्र समाप्त नहीं हो जाता। इसी के साथ, अदालत ने वर्ष 2003 में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) द्वारा जारी किए गए उस आदेश को पूरी तरह से निरस्त (Quash) कर दिया है, जिसके तहत हिंदुओं को केवल मंगलवार और वसंत पंचमी पर पूजा करने तथा मुस्लिम समुदाय को हर शुक्रवार को वहां नमाज अदा करने की व्यवस्था दी गई थी। कोर्ट के नए फैसले के बाद अब इस परिसर में केवल मंदिर व्यवस्था के अनुरूप ही धार्मिक गतिविधियां संचालित होंगी।

अदालत ने अपने फैसले में कानून व्यवस्था और सांप्रदायिक सद्भाव को बनाए रखने के लिए मुस्लिम समुदाय के धार्मिक हितों की रक्षा का भी विशेष ध्यान रखा है। खंडपीठ ने व्यवस्था दी है कि यदि मुस्लिम पक्ष (जैसे मौलाना कमालुद्दीन वेलफेयर सोसाइटी या कोई अन्य वक्फ निकाय) मस्जिद के निर्माण के लिए धार जिले के भीतर किसी उपयुक्त भूमि के आवंटन हेतु आवेदन करता है, तो राज्य सरकार कानून के दायरे में रहकर उस पर सहानुभूतिपूर्वक विचार कर सकती है और उन्हें वैकल्पिक जमीन आवंटित कर सकती है।

इसके अलावा, उच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया कि भोजशाला परिसर वर्ष 1904 से ही एक संरक्षित स्मारक रहा है, इसलिए इस पर 'प्लेस ऑफ वर्शिप एक्ट, 1991' (उपासना स्थल अधिनियम) के प्रावधान लागू नहीं होते। कोर्ट ने केंद्र सरकार और एएसआई को निर्देश दिया है कि वे भोजशाला मंदिर के सुचारू प्रशासन, प्रबंधन और वहां पुनः संस्कृत शिक्षण की व्यवस्था शुरू करने के संबंध में नीतिगत निर्णय लें। हालांकि, इस पूरे परिसर की सुरक्षा, संरक्षण और पर्यवेक्षण का मुख्य अधिकार एएसआई के पास ही रहेगा। इसके साथ ही, अदालत ने केंद्र सरकार को यह प्रयास करने का भी निर्देश दिया है कि लंदन के ब्रिटिश म्यूजियम में रखी मां वाग्देवी की मूल ऐतिहासिक प्रतिमा को वापस भारत लाकर भोजशाला परिसर में ससम्मान पुनस्र्थापित किया जाए। इस फैसले का हिंदू पक्ष ने स्वागत किया है, वहीं मुस्लिम पक्ष ने आदेश की समीक्षा कर इसे सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देने की बात कही है।