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मनुष्य की आंतरिक सुंदरता मृदुल मुस्कान से ही होती: बिमल सर्राफ

लोकल डेस्क, ऋषि राज।

रक्सौल: किसी को भी अपनी ओर आकर्षित करने के लिए स्वयं में कोई आकर्षण,विशेषता का होना आवश्यक है।कलाकार,विद्वान,पहलवान, डॉक्टर,धनवान आदि लोगों का ध्यान अपनी ओर खींचते हैं और एक सीमा तक सामयिक प्रशंसा भी प्राप्त कर लेते हैं।उक्त विचार लायंस क्लब ऑफ रक्सौल के अध्यक्ष सह मीडिया प्रभारी एवं भारत विकास परिषद् , रक्सौल के सेवा संयोजक सह मीडिया प्रभारी सह सामाजिक कार्यकर्ता बिमल सर्राफ ने प्रेस से साझा किया।जो प्रशंसा उन्हें प्राप्त होती उसमें स्थायित्व नहीं होता,कारण कि उनकी विशेषताएँ सिर्फ उन्हीं के लिए लाभ अर्जित करती हैं।लोगों को अधिक गहराई तक प्रभावित और आकर्षित करने के दो तरीके प्रमुख हैं।जो नितांत सस्ते भी हैं और उनके लिए कोई विशेष परिश्रम भी नहीं करना पड़ता।पैसा खर्च करने की कोई जरूरत ही नहीं पड़ती। मात्र मन में उनकी उपयोगिता,महत्व समझे जाने की आवश्यकता भर है।साथ ही उन विभूतियों को स्वभाव का अंग बनाने के लिए ध्यान देने की जरूरत है।ये दो तरीके हैं यथा मधुर वचन एवं मृदुल मुस्कान।इन दोनों को अपनाते ही चेहरा कमल पुष्प जैसा खिल उठता है,जिसकी शोभा भी असाधारण होती है और सुगंध भी।सुंदरता के लिए सभी इच्छुक  और आतुर होते हैं और इसके लिए खर्चीले श्रृंगार साधन भी जुटाते हैं।पर ये भूल जाते हैं कि यह बनावट कागज के फूलों जैसी है जो अपनी अवास्तविकता प्रकट किए बिना नहीं रहती,कितनी भी कुशलता उनमें लगी है पर कागज के फूल किसी को बहुत देर तक धोखा नहीं दे सकते।आच्छादनों के आधार पर साज-सज्जा के सहारे बनाई गई सुंदरता अपने नकलीपन को प्रकट किए बिना नहीं रहती।असली फूल की शोभा और सुगंध स्वाभाविक होती है इसलिए वह अपने समय तक यथावत बनी रहती है।चेहरे की मुस्कान के सम्बन्ध में भी यही बात है।वह मनःस्थिति को संतुष्ट,संतुलित,प्रसन्न रखने की प्रतिक्रिया मात्र है।उसे दर्पण के सहारे प्रयत्नपूर्वक भी अभ्यास में उतारा जा सकता है।