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मन को कुमार्ग से रोकना ही सबसे बड़ा पुरुषार्थ: बिमल सर्राफ

लोकल डेस्क, ऋषि राज।

रक्सौल: वह मत करो,जिसके लिए पीछे पछताना पड़े। निरर्थक वस्तुएँ बड़ी मात्रा में एकत्रित कर लेने से भी क्या लाभ,जो उत्तम है,उसका थोड़ा-संचय भी अच्छा है।उक्त विचार लायंस क्लब ऑफ रक्सौल के अध्यक्ष सह मीडिया प्रभारी एवं भारत विकास परिषद् , रक्सौल के सेवा संयोजक सह मीडिया प्रभारी सह सामाजिक कार्यकर्ता बिमल सर्राफ ने प्रेस से साझा किया। अव्यवस्थित और असंयत रहकर सौ वर्ष जीने की अपेक्षा,ज्ञानार्जन करते हुए और धर्मपूर्वक एक वर्ष जीवित रहना अच्छा है। धुंआँ देकर देर तक सुलगती रहने वाली और कालिख उत्पन्न करती रहने वाली अग्नि की अपेक्षा थोड़ी देर उज्जवल प्रकाश देकर बुझ जाने वाली आग सराहनीय है।जिसने धर्म का आधार छोड़ दिया,जो निरंकुश और स्वेच्छाचारी की तरह सोचता और करता है,उससे दुष्कर्म ही बन पड़ेंगे,वह कुमार्ग पर ही चल सकेगा।धर्म-बंधनों से अनेक स्थानों में बंधा हुआ मन ही उद्दंड घोड़े की तरह काबू में रह पाता है। ढालू जमीन पर फैलाया हुआ पानी  जिस प्रकार ऊपर की ओर नहीं चढ़ता,वैसे ही स्वेच्छाचारी मन न तो भली बातें सोचता है और न भले कार्य करता है।मन को कुमार्ग से रोकना ही सबसे बड़ा पुरुषार्थ है।जिसने अपने ऊपर संयम कर लिया,वह इस त्रैलोक्य का स्वामी है।पाप की अवेहलना न करो।वह थोड़ा होते हुए भी बड़ा अनिष्ट कर डालता है।आग की छोटी-सी-चिंगारी भी मूल्यवान वस्तुओं के ढेर को जला कर राख कर देती है। पला हुआ साँप कभी भी डस सकता है।मन में छिपा हुआ पाप कभी भी हमारे उज्जवल जीवन का नाश कर सकता है।जीवन अनमोल है,संपूर्ण संसार एक परिवार ही तो है।वसुधैव कुटुंबकम् ही हमारा ध्येय होना चाहिए।सुख-दुःख के मिश्रण से जीवन के संगीत का आनंद लेते रहना चाहिए।मनुष्य मोहवश यह कह बैठता है कि अमुक काम नहीं करेंगे तो घर का निर्वाह कैसे होगा।यह भ्रम छोड़ देना चाहिए।निर्वाह तो भगवान करते हैं,मनुष्य तो व्यर्थ का गर्व करता है।