लोकल डेस्क, एन के सिंह।
"साहब, अगर सिलेंडर नहीं मिला तो हम लकड़ी पर हजारों लोगों का खाना नहीं बना पाएंगे।"
पूर्वी चम्पारण: मोतिहारी की धरती पर इन दिनों एक अजीब सी खामोशी और बेचैनी है। यह बेचैनी किसी प्राकृतिक आपदा की नहीं, बल्कि 'नीले और लाल सिलेंडरों' की उस किल्लत की है जिसने जिले की रफ़्तार पर ब्रेक लगा दिया है। एक तरफ प्रशासन घरेलू गैस की कालाबाजारी पर नकेल कसने के लिए सड़कों पर है, तो दूसरी तरफ कमर्शियल गैस के 'सूखे' ने जिले की कमर तोड़ दी है। आलम यह है कि कहीं बच्चों की थाली खाली है, तो कहीं शहनाइयों की गूंज के बीच चूल्हे ठंडे पड़ने का डर सता रहा है।
शिक्षा पर वार, गैस की किल्लत से आंगनबाड़ी और स्कूलों में 'मिड-डे मील' बंद, लकड़ियों के धुएं में खोया मासूमों का निवाला।
लगन पर ग्रहण,शादियों का सीजन सिर पर, कमर्शियल सिलेंडर गायब; हलवाइयों ने खड़े किए हाथ।
तालाबंदी की नौबत,होटलों और रेस्टोरेंट में लटके ताले, व्यावसायिक प्रतिष्ठानों में अफरा-तफरी।
प्रशासनिक चुनौती,घरेलू गैस पर सख्ती का असर, लेकिन कमर्शियल गैस की किल्लत से जिला प्रशासन की बढ़ी मुश्किलें।
जब भूख और मजबूरी के बीच 'खाली सिलेंडर' दीवार बन गया
बुझने लगे स्कूलों के चूल्हे, मासूमों का निवाला छीना
जिले के प्राथमिक विद्यालयों और आंगनबाड़ी केंद्रों से आती तस्वीरें दिल को झकझोर देने वाली हैं। जिन केंद्रों पर सुबह-सुबह बच्चों की खिलखिलाहट और खिचड़ी की महक गूंजती थी, वहां अब सन्नाटा है। महीनों से गैस की नियमित आपूर्ति न होने के कारण उन मासूम बच्चों के सामने संकट खड़ा हो गया है, जिनके लिए स्कूल का खाना ही दिन का सबसे पुख्ता भोजन होता है। कहीं-कहीं शिक्षकों ने चंदा जुटाकर लकड़ियों का इंतजाम किया, लेकिन बारिश और नमी के बीच भीगे चूल्हों ने हार मान ली। सवाल यह है कि इन मासूमों की भूख का हिसाब कौन देगा?
लगन की खुशियों पर 'किल्लत' का साया*
हिंदू रीति-रिवाजों में शादी सिर्फ दो दिलों का मिलन नहीं, बल्कि सैकड़ों मेहमानों की दावत का उत्सव है। लगन का सीजन दरवाजे पर दस्तक दे रहा है, लेकिन व्यावसायिक गैस (कमर्शियल सिलेंडर) की कमी ने खुशियों के रंग में भंग डाल दिया है। जिन घरों में शहनाइयां बजने वाली हैं, वहां लोग गैस एजेंसियों के चक्कर काट रहे हैं। हलवाइयों का कहना साफ है
"साहब, अगर सिलेंडर नहीं मिला तो हम लकड़ी पर हजारों लोगों का खाना नहीं बना पाएंगे।"
ऐसे में मध्यमवर्गीय परिवार कालाबाजारी के डर से सहमे हुए हैं कि कहीं बेटी की विदाई के वक्त चूल्हा ही जवाब न दे दे।
पैनिक बटन दबा, एजेंसियों पर उमड़ा जनसैलाब
भले ही फाइलों में आपूर्ति के दावे किए जा रहे हों, लेकिन हकीकत गैस एजेंसियों के बाहर लगी उन लंबी कतारों में छिपी है जहां लोग सुबह 4 बजे से ही अपनी बारी का इंतजार कर रहे हैं। कमर्शियल गैस की रफ्तार सुस्त होने से छोटे होटल संचालक और रेहड़ी-पटरी वाले अब सड़कों पर उतरने को मजबूर हैं। शहर के कई छोटे होटलों में 'आज खाना उपलब्ध नहीं है' के बोर्ड लटकने लगे हैं।
प्रशासनिक सक्रियता और भविष्य का डर
पूर्वी चम्पारण जिला प्रशासन हालांकि मुस्तैद है। घरेलू गैस की कालाबाजारी रोकने के लिए सघन छापेमारी की जा रही है, जिससे आम घरों को थोड़ी राहत मिली है। प्रशासन लगातार पैनिक हो रहे लोगों को ढांढस बंधा रहा है। लेकिन जानकारों का मानना है कि यदि कमर्शियल सिलेंडरों की आपूर्ति को लेकर कोई ठोस और त्वरित कदम नहीं उठाया गया, तो जिले की आर्थिक गतिविधियों पर इसका गहरा और 'विस्फोटक' असर पड़ना तय है।
मोतिहारी का यह गैस संकट अब सिर्फ एक व्यापारिक समस्या नहीं रही, बल्कि एक सामाजिक त्रासदी का रूप ले रही है। अब देखना यह है कि प्रशासन और गैस एजेंसियां मिलकर इस 'गैस के ग्रहण' को कब तक हटा पाती हैं, ताकि स्कूलों के चूल्हे फिर से जलें और शादियों की मिठास बरकरार रहे।







