Ad Image
Ad Image
ट्रंप ने कहा, खाड़ी देशों की अपील पर ईरान पर हमले बंद किए गए || अदाणी समूह को अमेरिका से क्लीनचिट, आपराधिक मामलों में राहत || राहुल गांधी ने कहा, देश में बड़ा आर्थिक संकट आने वाला, आम आदमी होगा परेशान || भारत और नार्वे के बीच कुल 9 समझौतों पर हस्ताक्षर, बेहतर सहयोग की पहल: मोदी || अहमदाबाद - मुंबई हाईवे पर दर्दनाक सड़क हादसा, 12 की मौत 25 से ज्यादा घायल || राष्ट्रपति ट्रंप का दावा: समझौते के लिए ईरान बेताब, ईरान का इनकार || Delhi - NCR में सीएनजी फिर महंगा, तीन दिन में तीसरी बार कीमत वृद्धि || PM मोदी का नीदरलैंड दौरा, द्विपक्षीय रिश्ते की बेहतरी पर बल दिया || लन्दन: ब्रिटिश PM कीर स्टारमर दे सकते है इस्तीफा, स्थानीय चुनावों में पार्टी की हार का असर || युद्ध समाप्ति पर ईरान के साथ सकारात्मक बातचीत हुई: राष्ट्रपति ट्रंप

The argument in favor of using filler text goes something like this: If you use any real content in the Consulting Process anytime you reach.

  • img
  • img
  • img
  • img
  • img
  • img

Get In Touch

मोतिहारी: सिस्टम की 'काली कोठरी' में दम तोड़ता न्याय

लोकल डेस्क, एन के सिंह।

अच्छेलाल की मौत: पुलिसिया थ्योरी और मेडिकल रिपोर्ट के बीच उलझी एक 'अबूझ पहेली'

पूर्वी चम्पारण : कहते हैं कानून के हाथ लंबे होते हैं, लेकिन जब वही हाथ किसी की गर्दन तक पहुँच जाएं और व्यवस्था मूकदर्शक बनी रहे, तो सवाल उठना लाजिमी है। पूर्वी चम्पारण के हरसिद्धि थाने के घियूढार से शुरू हुई एक गिरफ्तारी का अंत मोतिहारी सदर अस्पताल के मुर्दाघर में होगा, यह किसी ने नहीं सोचा था। 35 वर्षीय अच्छेलाल पासवान की मौत आज न केवल एक परिवार के लिए मातम है, बल्कि पूरे प्रशासनिक तंत्र की कार्यशैली पर एक बदनुमा दाग भी है।

65 वर्षीय रामकली के 3 पुत्रोंन में से एक को काल ने पहले ही निगल लिया था, अब दूसरे पुत्र को व्यवस्था निगल गयी है। रामकली का ही पुत्र था अच्छेलाल। अभी 35 वर्ष की उम्र का ही तो था। 5 अप्रैल को पुलिस ने गिरफ्तार किया और 9 अप्रैल को उसकी मौत हो गयी। पूर्वी चंपारण में अच्छेलाल की मौत अबूझ पहेली बनी हुई है। चिकित्सकों की टीम भी मौत का कारण नहीं ढूंढ पाई है। वेसरा प्रीजर्व किया गया है।

गिरफ्तारी से श्मशान तक

चंद घंटों में बदल गई जिंदगी कहानी शुरू होती है 5 अप्रैल को, जब शराब के धंधे के आरोप में पुलिस अच्छेलाल को उसके घर से उठाती है। 6 अप्रैल को उसे न्यायालय में पेश किया जाता है और वहां से जेल भेज दिया जाता है। लेकिन असली पेच यहीं फंसता है—अगर पुलिस की शुरुआती मेडिकल जांच में वह 'फिट' था, तो जेल प्रशासन ने उसे अंदर लेने से मना क्यों कर दिया? आखिर जेल के गेट पर ऐसा क्या दिखा जो पुलिस की आंखों से ओझल था?
9 अप्रैल की सुबह जब अस्पताल के नशा मुक्ति वार्ड में अच्छेलाल ने दम तोड़ा, तो पीछे छोड़ गया कई अनुत्तरित प्रश्न

फिटनेस का खेल 

जब शुरुआती जांच में वह बीमार था, तो उसे इलाज के बजाय जेल की दहलीज तक क्यों ले जाया गया? क्या हरसिद्धि पुलिस की 'इंसानियत' उस वक्त सो रही थी?
 अक्षम तंत्र 35 साल का एक नौजवान, जिसे कोई पुरानी बीमारी नहीं थी, वह तीन दिन तक अस्पताल में रहने के बावजूद दम तोड़ देता है। क्या सदर अस्पताल के चिकित्सक इतने अक्षम हैं कि वे मौत की आहट तक नहीं पहचान सके?

रेफर की खानापूर्ति अगर स्थिति गंभीर थी, तो उसे किसी 'हायर सेंटर' क्यों नहीं भेजा गया? क्या सिस्टम किसी चमत्कार का इंतजार कर रहा था या सिर्फ मौत की औपचारिकता पूरी की जा रही थी?

बिसरा (Visceral) में कैद इंसाफ: क्या समय पर मिलेगी रिपोर्ट?

अच्छेलाल की मौत के कारणों को तलाशने के लिए गठित तीन सदस्यीय चिकित्सकों की टीम भी फेल साबित हुई। अब उसकी मौत का राज 'बिसरा' (अंगों के अवशेष) में कैद है। लेकिन यहां भी तकनीक और लापरवाही का डर हावी है।

विशेषज्ञों का मानना है कि प्रिजर्व किए गए अंगों के अवशेष कोल्ड चेन मेंटेन होने पर ही सुरक्षित रह सकते हैं। नेचुरल साल्ट और फॉर्मोलिन के घोल में रखे ये अवशेष अधिकतम 15 दिनों तक ही जांच के योग्य रहते हैं। इसके बाद अंगों का क्षरण (Decomposition) शुरू हो जाता है और मौत का कारण स्पष्ट होना लगभग नामुमकिन हो जाता है।

पूर्वी चम्पारण के थानों में महीनों तक धूल फांकते पुराने बिसरा के नमूने गवाह हैं कि यहाँ न्याय की रफ्तार कितनी धीमी है। ऐसे में सवाल खड़ा होता है कि क्या हरसिद्धि पुलिस समय रहते इसकी जांच करा पाएगी? या फिर देरी के नाम पर साक्ष्यों को मिटने का मौका दिया जा रहा है?

चीखता परिवार, खामोश प्रशासन

अच्छेलाल की पत्नी माला देवी और मां रामकली देवी के आंसू थमने का नाम नहीं ले रहे। उनका सीधा आरोप है कि अच्छेलाल की मौत स्वाभाविक नहीं, बल्कि पुलिसिया तंत्र की लापरवाही और जुल्म का नतीजा है।

अच्छेलाल की मौत अब केवल एक केस फाइल नहीं है, बल्कि यह उस सिस्टम की पोल खोलती कहानी है जहाँ 'इलाज' के नाम पर 'इंतजार' कराया जाता है और 'सुरक्षा' के नाम पर 'संदेह' पैदा किया जाता है। जब तक बिसरा की रिपोर्ट आएगी, तब तक शायद यह मामला फाइलों के नीचे दब जाए, लेकिन पीड़ित परिवार की न्याय की उम्मीद धीरे-धीरे उस प्रिजर्व किए गए अंग की तरह ही धूमिल होती जा रही है।