स्टेट डेस्क, आर्या कुमारी।
पटना। बिहार में लागू शराबबंदी कानून को लेकर सियासी बहस एक बार फिर तेज हो गई है। इस बार सवाल विपक्ष की ओर से नहीं, बल्कि सत्ताधारी दल के भीतर से उठे हैं। जनता दल (यूनाइटेड) के सीतामढ़ी सांसद देवेश चंद्र ठाकुर ने कानून को पूरी तरह समाप्त करने की मांग करते हुए इसे अव्यावहारिक बताया है।
उन्होंने एक समाचार चैनल से बातचीत में कहा कि वे शुरू से ही शराबबंदी नीति के विरोध में रहे हैं और इसका अपेक्षित परिणाम नहीं मिला। उनके अनुसार, जब यह कानून लागू किया जा रहा था, तब उन्होंने मुख्यमंत्री के समक्ष अपनी असहमति भी जताई थी। सांसद ने कहा कि शराबबंदी का उद्देश्य भले ही सामाजिक सुधार था, लेकिन व्यवहारिक स्तर पर यह नीति सफल साबित नहीं हो सकी है।
सांसद ने स्वीकार किया कि शराब से घरेलू हिंसा, आर्थिक नुकसान और सामाजिक समस्याएं बढ़ती हैं तथा सरकार की मंशा सही थी, लेकिन पूरी तरह प्रतिबंध लागू करना व्यावहारिक नहीं है। उन्होंने कहा कि बिहार की सीमाएं झारखंड, उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल से जुड़ी होने के कारण शराब की तस्करी पूरी तरह रोक पाना संभव नहीं हो पाया है और किसी न किसी तरीके से शराब राज्य में पहुंच ही जाती है।
इस दौरान उन्होंने शराबबंदी लागू होने के समय का एक प्रसंग भी साझा किया। उन्होंने बताया कि जब विधानसभा और विधान परिषद में सदस्यों को शराब नहीं पीने की शपथ दिलाई जा रही थी, तब वे उपस्थित नहीं थे। बाद में पूछे जाने पर उन्होंने कहा था कि जब कानून पहले ही पारित हो चुका है तो अलग से शपथ की आवश्यकता नहीं है। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि कानून बिहार के लिए है, ऐसे में राज्य के बाहर शराब सेवन को लेकर शपथ का क्या औचित्य है।
राजस्व हानि और बढ़ती तस्करी के बावजूद कानून की समीक्षा नहीं होने के सवाल पर सांसद ने कहा कि अंतिम निर्णय पार्टी नेतृत्व और शीर्ष स्तर पर ही लिया जाएगा। उन्होंने स्पष्ट किया कि जो भी फैसला नेतृत्व करेगा, वह उसका समर्थन करेंगे। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि सत्ता पक्ष के भीतर से उठ रही ऐसी आवाजें आने वाले समय में शराबबंदी कानून पर नई बहस को जन्म दे सकती हैं।







