लोकल डेस्क, ऋषि राज।
रक्सौल: सत्य एक है,अनेक नहीं।सत्य अनेक नहीं हो सकता।अनेक में एक ही सत्य की अभिव्यक्ति होती है।जैसे चंद्रमा एक होता है,परंतु नदी के हर जलकण में वह अलग अलग दीखता प्रतीत होता है।
अगर इस प्रतीति को कोई सत्य मान ले तो वह उसकी अज्ञानता ही है। उक्त विचार लायंस क्लब ऑफ रक्सौल के अध्यक्ष सह मीडिया प्रभारी एवं भारत विकास परिषद् , रक्सौल के सेवा संयोजक सह मीडिया प्रभारी सह सामाजिक कार्यकर्ता बिमल सर्राफ ने प्रेस से साझा किया।सत्य एक ही है परंतु वहाँ तक पहुँचने के मार्ग व द्वार अनेक हो सकते,जो द्वार के आकर्षण में उलझ गया,वो द्वार पर ही ठहर जाता,ऐसे में सत्य की निकटता सुलभ नहीं होती अपितु दुर्लभ ही बनी रहती है।जो आँखों से दीखता है,वह इंद्रियजन्य सत्य है।संसार में जिस सत्य का हम अनुभव करते हैं,वह सापेक्ष सत्य है।सत्य तो है ; क्योंकि वह हमारे सामने है,परंतु उसकी तुलना में कोई दूसरा आ जाए तो पहला सत्य कमजोर पड़ जाता है। सापेक्ष सत्य दिककाल के अंतर्गत होता जबकि निरपेक्ष सत्य देशगत या कालगत सत्ता नहीं है।निरपेक्ष सत्य,स्थान और समय से परे और पार होता है। वह जैसा है,वैसा ही है।इसमें कहीं कोई परिवर्तन नहीं होता है।निरपेक्ष सत्य केवल परमात्मा ही हो सकते हैं।निरपेक्ष सत्य किसी भी काल-बंधन से सर्वथा मुक्त है।इस पर त्रिकाल का कोई प्रभाव नहीं पड़ता है।सत्य कालातीत है।काल को तीन खंडों में बाँटा गया है।
भूत अर्थात वह समय,जो गुजर गया है अब आएगा नहीं, वर्तमान जो अभी है,बना हुआ है तथा भविष्य जो अभी आने वाला है।सत्य की चाह कैसे पैदा हो,सत्य किस तरह जीवन में उतरे और कैसे इसे पाया जाए - उपनिषदकार् कहते हैं कि यदि सत्य की चाह है तो चित्त को किसी भी आग्रह से मत बाँधो। जहाँ आग्रह है वहाँ सत्य आ ही नहीं सकता।आग्रह और सत्य में गहरा विरोध है।मुक्त जिज्ञासा सत्य की खोज के लिए पहली सीढ़ी है।जिज्ञासा - खोज की गति और प्राण है।इससे ही विवेक जागृत होता है।इसी के द्वारा उचित और अनुचित में भेद किया जा सकता है।







