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सफलता का स्वरूप हिमखंड की तरह : बिमल सर्राफ

नेशनल डेस्क।

रक्सौल। जीवन में सफलता एक सापेक्ष शब्द है। भिन्न-भिन्न व्यक्तियों के लिए सफलता के माने भिन्न हो सकते हैं।किसी के लिए इसका आधार धनकुबेर बनना हो सकता है,तो किसी के लिए बड़ा नाम, यश व पद।उक्त विचार लायंस क्लब ऑफ रक्सौल के अध्यक्ष सह मीडिया प्रभारी सह सामाजिक कार्यकर्ता लायन बिमल सर्राफ ने प्रेस से साझा किया।

कोई थोड़े में ही सफलता की संतुष्टि अनुभव कर सकते हैं,तो कोई सब कुछ पाकर भी सफलता की संतुष्टि से वंचित रह सकते हैं।कुछ ऐसे भी इंसान हैं,जिनके लिए सांसारिक नाम-दाम व उपलब्धियाँ अधिक माने नहीं रखते। राह में आ जाएँ तो इन्हें पुण्य-प्रारब्ध मानकर कर्तव्य कर्म के रूप में निभा जाते हैं और ब्राह्य उपलब्धियों से अधिक इनकी सफलता के माने आंतरिक पूर्णता से अधिक जुड़े होते हैं।

ये प्रणीत धर्म,अर्थ,काम एवं मोक्ष के जीवन दर्शन में विश्वास रखते हैं और समग्र सफलता को अपना मार्गदर्शक मानते हैं।हर मानव में इस परिपूर्ण सफलता की चाह नैसर्ग में मिली हुई है;क्योंकि मूलतः वह ईश्वर का अंश है और उसकी पूर्णता का उत्तराधिकारी है,लेकिन यह बात दूसरी है कि कुछ ही सौभाग्यशाली इस समग्र सफलता को हस्तगत कर पाते हैं और यह अकारण नहीं है।इसके मूल में एक लक्ष्य के निमित्त दीर्घकालीन श्रम,समर्पण एवं नैष्टिक प्रयास निहित रहते हैं और कुछ नियति द्वारा निर्धारित विधान की भूमिका रहती है।सफलता के स्वरूप एक आइसबर्ग (हिमखंड) की तरह होता है,जिसका मात्र 10% भाग ही ऊपर सतह पर दिखाई देता है,शेष 90% भाग पानी के नीचे अदृश्य रहता है।

ऐसे ही इंसान को दृश्यमान सफलता की तात्कालिक ऊपरी चमक-दमक भरी उपलब्धियों का आंशिक सत्य ही दिखाई पड़ता है,जिसे देख उसकी आँखें चुंधिया रही होती हैं।जबकि पूर्ण सत्य सतह के नीचे की समय-साध्य एवं कष्टसाध्य जटिल सच्चाई में छिपा होता है।कोई भी सफल व्यक्ति ल आत्मानुशासन की भट्टी में तप कर किसी सार्थक कहे जाने जाने योग्य मुकाम तक पहुँच पाता है।उसकी सफलता के पीछे उसका प्रचंड पुरुषार्थ,अनवरत प्रयास,असीम धैर्य और अथक श्रम सक्रिय रहते हैं।