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सभ्यता व संस्कृति परिष्कार की प्रवृत्ति से ही पनपती है: बिमल सर्राफ

लोकल डेस्क, ऋषि राज।

रक्सौल: परिष्कार की प्रवृत्ति सामाजिक क्षेत्र में सभ्यता और आंतरिक क्षेत्र में संस्कृति कहलाती है।शिल्पी,कलाकार,चिकित्सक,शिक्षक,विज्ञानी,माली आदि वर्गों के लोग अपने श्रम और मनोयोग का उपयोग सृजनात्मक प्रयोजनों के लिए करते हैं।

उक्त विचार लायंस क्लब ऑफ रक्सौल के अध्यक्ष सह मीडिया प्रभारी एवं भारत विकास परिषद् , रक्सौल के सेवा संयोजक सह मीडिया प्रभारी सह सामाजिक कार्यकर्ता बिमल सर्राफ ने प्रेस से साझा किया।उपरोक्त व्यक्ति अनगढ़ को सुगढ़ बनाते हैं।यह धरती जिस पर हम रहते हैं,अपने जन्मकाल में ऐसी न थी।इसे प्रयत्नपूर्वक वह रूप दिया गया है,जिसमें कि आज की सभ्यता रह रही है। मनुष्य ने अपने संकल्प,श्रम एवं कौशल के आधार पर उसे समतल किया,रास्ते बनाए,कृषि,पशु पालन,औजार,अग्नि, वाहन के उपाय ढूंढे और क्रमशः सामाजिकता,शासन,शिक्षा, चिकित्सा,व्यवसाय,सुरक्षा एवं सुविधा-साधनों के आधार खड़े कर दिए। मनुष्य को सृष्टि का मुकट-मणि होने का लाभ इसी मार्ग पर चलने पर ही मिल सका है। यह परिष्कार की प्रवृत्ति ही मानवी गरिमा और प्रगति का सार तत्व कही जा सकती है।

मानवीसत्ता इस सृष्टि की सबसे महत्वपूर्ण इकाई है।उसे ईश्वर के बाद दूसरा स्थान दिया जा सकता है।उसका परिष्कार कर सकना इतना बड़ा प्रयोग है जिसे भौतिक प्रगति के लिए खड़े किए गए आधारों से कम नहीं अधिक ही महत्व दिया जा सकता है।प्रकृति जड़ है।भौतिक विज्ञान का कार्य,वाह्य जगत में बिखरी पड़ी पदार्थ संपदा को तथा अनुकूलता को बढ़ाना है।इस प्रयास की उपयोगिता सहज ही समझी जा सकती है।उसे समुचित श्रेय भी मिला है।प्रगति का कौशल प्राप्त करने की इच्छा भी सभी को रहती है और जिससे जितना बनता है उतना प्रयास भी करता है।

यह उचित भी और बुद्धिमत्ता पूर्ण भी है। यहाँ एक ही कमी अखरती है कि आत्म-चेतना का महत्व क्यों नहीं समझा जाता ? आंतरिक उत्कृष्टता के कारण उत्पन्न होने वाले  लाभों पर विचार क्यों नहीं किया जाता ? आत्म-परिष्कार की उपेक्षा क्यों होती ? प्रगति की बात वाह्य जीवन एवं वाह्य जगत तक ही क्यों सीमित रखी जा रही है ? यह क्यों नहीं विचारा जाता कि जड़ से चेतन महत्वपूर्ण है। भौतिक विज्ञान ने आश्चर्यजनक प्रगति की है। किन्तु आत्म-विज्ञान बेतरह पिछड़ गया है।इससे संतुलन बना नहीं बिगड़ा है।वैभव के साथ-साथ उत्तरदायी दृष्टिकोण भी विकसित होना पड़ा अन्यथा बंदर के हाथ तलवार पड़ने पर अनर्थ ही हो सकता है।सभी को गहन चिंतन की आवश्यकता है।