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सादगी और संघर्ष से बने जननायक कर्पूरी ठाकुर की अमर गाथा

स्टेट डेस्क, आर्या कुमारी।

समस्तीपुर। पूर्व मुख्यमंत्री और भारत रत्न जननायक कर्पूरी ठाकुर की जयंती पर उनकी सादगी, ईमानदारी और संघर्ष से भरे जीवन के किस्से एक बार फिर चर्चा में हैं। रिक्शे की सवारी, फटा कोट पहनकर विदेश यात्रा और जीवनभर की कमाई गांव के घर के लिए सौंप देने जैसी घटनाएं उनकी बेदाग छवि को उजागर करती हैं।

कर्पूरी ठाकुर की पहचान सत्ता में रहते हुए भी आम आदमी जैसा जीवन जीने वाले नेता की रही। कहा जाता है कि वे मुख्यमंत्री रहते हुए भी अक्सर रिक्शे से सफर करते थे और साधारण कपड़ों में ही सार्वजनिक कार्यक्रमों में शामिल होते थे। उनकी ईमानदारी पर सवाल उठाने का साहस शायद ही किसी ने किया हो।

उनके जीवन से जुड़ा एक प्रेरक प्रसंग यह भी है कि उन्होंने अपनी पूरी जीवनभर की कमाई अपने गांव में घर बनवाने के लिए दे दी थी। यह राशि उन्होंने अपने एक सहकर्मी को सौंपते हुए कहा था कि इसे सुरक्षित रखकर गांव में घर बनवा दिया जाए। कुछ ही दिनों बाद उनका निधन हो गया और उनका यह सपना अधूरा रह गया।

कर्पूरी ठाकुर के नाम से जुड़ा एक दिलचस्प किस्सा भी खूब प्रचलित है। प्रारंभिक शिक्षा तक उनका नाम ‘कपूरी ठाकुर’ था। स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान एक भाषण से प्रभावित होकर वरिष्ठ नेता रामनंदन मिश्र ने कहा था कि “तुम कपूरी नहीं, कर्पूरी हो, तुम्हारी खुशबू दूर-दूर तक फैलेगी।” तभी से वे कर्पूरी ठाकुर कहलाने लगे।

उनका जीवन शिक्षा के लिए संघर्ष का भी प्रतीक रहा। सामाजिक भेदभाव के कारण उन्हें छिपकर पढ़ाई करनी पड़ी। खलिहान में बैठकर शिक्षक की आवाज सुनकर शिक्षा ग्रहण करना उनके जुझारू स्वभाव को दर्शाता है। कठिन परिस्थितियों के बावजूद उन्होंने पढ़ाई जारी रखी और आगे चलकर समाज के सबसे बड़े नेताओं में शुमार हुए।

जनता के हित में नीतिगत फैसले लेने और वंचित वर्गों की आवाज बनने के कारण उन्हें ‘जननायक’ की उपाधि मिली। पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर ने उन्हें यह सम्मान दिया था। सत्ता में रहते हुए भी उन्होंने कभी रिश्तेदारों या करीबियों को अनुचित लाभ नहीं पहुंचाया और स्वावलंबन का संदेश दिया।

कर्पूरी ठाकुर का जीवन आज भी राजनीति और समाज दोनों के लिए एक आदर्श है, जो यह सिखाता है कि सादगी, ईमानदारी और संघर्ष से ही सच्चा जननायक बना जा सकता है।