नेशनल डेस्क, नीतीश कुमार
नई दिल्ली, उच्चतम न्यायालय ने गाजियाबाद के एक युवक के मामले में जीवन रक्षक प्रणाली हटाने की अनुमति देते हुए ‘पैसिव यूथेनेशिया’ (निष्क्रिय इच्छामृत्यु) को मंजूरी दी है।
न्यायमूर्ति जे.बी. पारदीवाला और न्यायमूर्ति के.वी. विश्वनाथन की पीठ ने यह आदेश सुनाया। अदालत का यह फैसला 2018 के ‘कॉमन कॉज’ मामले में दिए गए निर्णय पर आधारित है, जिसे 2023 में संशोधित किया गया था। उस फैसले में गरिमा के साथ मरने के अधिकार को मौलिक अधिकार के रूप में मान्यता दी गई थी।
यह मामला गाजियाबाद के 31 वर्षीय हरीश राणा से जुड़ा है, जो एक इमारत से गिरने के बाद पिछले 13 वर्षों से चेतनाशून्य अवस्था में हैं। मस्तिष्क में गंभीर चोट के कारण उनके सभी अंग लकवाग्रस्त हो गए थे और वह ‘परसिस्टेंट वेजिटेटिव स्टेट’ (पीवीएस) में चले गए थे।
मेडिकल रिपोर्टों के अनुसार इतने लंबे समय के बाद भी उनकी स्थिति में कोई सुधार नहीं हुआ है। वह केवल सर्जरी के जरिए लगाए गए पीईजी ट्यूब के माध्यम से दिए जाने वाले चिकित्सकीय पोषण के सहारे जीवित हैं।
पीठ ने यह आदेश हरीश राणा के पिता की ओर से दायर याचिका पर दिया, जिसमें उन्होंने अपने बेटे को लगाए गए सभी जीवन रक्षक उपकरण हटाने की अनुमति देने की मांग की थी।







