नेशनल डेस्क, श्रेया पाण्डेय ।
दिल्ली: केंद्रीय गृह और सहकारिता मंत्री अमित शाह ने रविवार को राजधानी के ऐतिहासिक लाल किला मैदान में आयोजित भव्य 'जनजाति सांस्कृतिक समागम' को संबोधित किया। भगवान बिरसा मुंडा के 150वें जयंती वर्ष के अवसर पर आयोजित इस महाकुंभ में देश के कोने-कोने से हजारों की संख्या में आदिवासी समाज के लोग अपनी पारंपरिक वेशभूषा और वाद्य यंत्रों के साथ शामिल हुए। कार्यक्रम को संबोधित करते हुए अमित शाह ने कहा कि हिंदू समाज और जनजातीय समुदाय अलग नहीं बल्कि एक ही हैं। उन्होंने कुछ राजनीतिक और सामाजिक तत्वों पर दोनों समाजों के बीच दूरी पैदा करने का षड्यंत्र रचने का आरोप लगाया।
गृह मंत्री ने कहा कि जो लोग हमारे बीच भेदभाव पैदा करने की कोशिश कर रहे हैं, उन्हें भारतीय संस्कृति के इतिहास का ज्ञान नहीं है। उन्होंने कहा, "हम सब एक ही रक्त हैं। जनजातीय समाज की आस्थाएं, उनकी जीवन पद्धति और प्रकृति की पूजा पूरी तरह से सनातन परंपरा से ही जुड़ी हुई हैं। वनवासी समुदाय जल, जंगल और जमीन की रक्षा करते हुए प्रकृति को पूजता है और यही अटूट परंपरा उन्हें सनातन धर्म का अभिन्न हिस्सा बनाती है।" उन्होंने इतिहास का उदाहरण देते हुए कहा कि हजारों साल पहले भगवान श्रीराम ने शबरी के झूठे बेर खाकर और निषादराज को गले लगाकर यह संदेश दिया था कि समाज में कोई भेद नहीं है।
अमित शाह ने जबरन और लालच देकर कराए जाने वाले धर्म परिवर्तन (मतांतरण) के मुद्दे पर भी कड़ा रुख अपनाया। उन्होंने कहा कि देश का संविधान हर नागरिक को अपनी आस्था और धर्म के साथ सम्मानपूर्वक जीने का अधिकार देता है। किसी को भी लोभ या दबाव में किसी का धर्म बदलने की अनुमति नहीं दी जा सकती। उन्होंने उपस्थित जनसमुदाय से अपनी संस्कृति और मूल धर्म की रक्षा का संकल्प लेने का आह्वान किया। इसके साथ ही, गृह मंत्री ने आदिवासियों को आश्वस्त करते हुए साफ किया कि देश में लागू होने वाले समान नागरिक संहिता (यूसीसी) से आदिवासी समाज की परंपराओं और अधिकारों पर कोई विपरीत असर नहीं पड़ेगा। मोदी सरकार ने जनजातीय समाज के हितों को हमेशा सुरक्षित रखा है।
अपने संबोधन में गृह मंत्री ने आदिवासी कल्याण के लिए केंद्र सरकार द्वारा उठाए गए कदमों का भी ब्यौरा दिया। उन्होंने कहा कि पहले की सरकारों के समय जनजातीय विकास का बजट मात्र 28 हजार करोड़ रुपये हुआ करता था, जिसे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में पांच गुना बढ़ाकर 1 लाख 50 हजार करोड़ रुपये कर दिया गया है। देश को पहली बार एक आदिवासी महिला राष्ट्रपति मिली हैं और कई राज्यों में आदिवासी मुख्यमंत्री विकास की कमान संभाल रहे हैं। उन्होंने यह भी दावा किया कि जिस नक्सलवाद ने 40 हजार से अधिक आदिवासियों की जान ली, सरकार ने उसे पूरी तरह समाप्त कर दिया है। PESA कानून को अब कागजों से निकालकर जमीन पर लागू किया जा रहा है ताकि सुदूर गांवों तक अधिकार पहुंच सकें। यह समागम आने वाले समय में देश की एकता और जनजातीय गौरव के महाकुंभ के रूप में याद किया जाएगा।







