नेशनल डेस्क - वेरॉनिका राय
5 नई दिल्ली। अभिनेता राजपाल यादव एक बार फिर सुर्खियों में हैं, लेकिन इस बार वजह उनकी कॉमेडी नहीं बल्कि एक पुराना कानूनी विवाद है। करीब 16 साल पहले फिल्म निर्माण के लिए लिए गए 5 करोड़ रुपये के चेक बाउंस मामले में राजपाल यादव को कानूनी पचड़े का सामना करना पड़ा, जिसके चलते उन्हें तिहाड़ जेल में आत्मसमर्पण करना पड़ा।
मामला फिल्म ‘अता पता लापता’ से जुड़ा है। राजपाल यादव ने फिल्म बनाने के लिए दिल्ली के उद्यमी माधौगोपाल अग्रवाल की कंपनी मुरली प्रोजेक्ट्स प्राइवेट लिमिटेड से 5 करोड़ रुपये लिए थे। राजपाल का दावा था कि यह रकम फिल्म में निवेश के तौर पर दी गई थी, जबकि कंपनी ने इसे उधार बताया। यहीं से विवाद की शुरुआत हुई।
सात चेक बाउंस, कोर्ट तक पहुंचा मामला
कंपनी के मुताबिक, फिल्म रिलीज के बाद बॉक्स ऑफिस पर उम्मीद के मुताबिक प्रदर्शन नहीं कर पाई। जब कंपनी ने अपनी रकम वापस मांगी तो राजपाल यादव ने घाटे का हवाला दिया। इसके बाद उन्होंने जो सात चेक दिए, वे सभी बाउंस हो गए।
अप्रैल 2010 में इस मामले की प्राथमिकी दिल्ली के प्रीत विहार थाने में दर्ज कराई गई, जिसके बाद केस कड़कड़डूमा कोर्ट पहुंचा।
कड़कड़डूमा कोर्ट का फैसला
24 अप्रैल 2018 को कड़कड़डूमा कोर्ट ने राजपाल यादव को दोषी ठहराते हुए छह महीने की सजा सुनाई। हालांकि उस समय उन्हें साढ़े तीन लाख रुपये के निजी मुचलके पर जमानत दे दी गई। कोर्ट ने आदेश दिया कि राजपाल यादव उधार ली गई रकम के साथ-साथ प्रति चेक 1.6 करोड़ रुपये हर्जाने के तौर पर शिकायतकर्ता को अदा करेंगे।
हाईकोर्ट से नहीं मिली राहत
राजपाल यादव तय समय पर रकम नहीं चुका सके। इसके बाद मामला दिल्ली हाईकोर्ट पहुंचा, जहां 4 फरवरी तक कोर्ट में हाजिर होने का आदेश दिया गया था। राजपाल समय पर कोर्ट नहीं पहुंच सके। उनके वकील ने दलील दी कि अभिनेता रकम जुटाने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन अदालत ने इस तर्क को स्वीकार नहीं किया और याचिका खारिज कर दी।
तिहाड़ जेल में आत्मसमर्पण
दिल्ली हाईकोर्ट से राहत न मिलने के बाद राजपाल यादव को तिहाड़ जेल में आत्मसमर्पण करना पड़ा। हालांकि, उनके पास सुप्रीम कोर्ट में अपील करने का विकल्प अभी भी खुला है, जिस पर परिवार विचार कर सकता है।
एक चूक, जो भारी पड़ गई
राजपाल यादव का कहना है कि उन्होंने कागजातों को पूरी तरह पढ़े बिना भरोसे में आकर साइन कर दिए थे। लेकिन कोर्ट के सामने दस्तावेजों पर उनके हस्ताक्षर और बाउंस चेक अहम सबूत बन गए, जिसके आगे बचाव पक्ष की दलीलें कमजोर साबित हुईं।
यह मामला एक बार फिर यह सवाल खड़ा करता है कि फिल्म इंडस्ट्री में निवेश और उधार के बीच की कानूनी बारीकियों को नजरअंदाज करना किस तरह भारी पड़ सकता है।







