स्टेट डेस्क, मुस्कान कुमारी।
मुंबई। 112 साल पुराने एलफिंस्टन ब्रिज का आखिरी 30,000 किलो का गर्डर हटते ही निर्माण स्थल पर आतिशबाजी गूंज उठी। MRIDC की टीम ने 58 रातों की अथक मेहनत के बाद 5 अप्रैल की सुबह इसे पूरी तरह ढहा दिया।
अंतिम पलों का रोमांच
सुबह ठीक 6 बजे वेल्डर सीढ़ी पर चढ़कर गर्डर के बीच वाले अंतिम इंच स्टील को काट रहा था। क्रेन की रस्सियां पहले से बंधी हुई थीं। वेल्डर नीचे उतरा तो मजदूरों ने ‘रस्सा पकड़ो’ का नारा लगाया। पूर्वी छोर पर एक मजदूर ने क्राउबार से गर्डर को धक्का दिया। भारी गर्डर हवा में झूला और ब्रिज का सफर हमेशा के लिए खत्म हो गया। ठेकेदार ने पहले से पटाखे तैयार रखे थे। पूरी टीम थकान भरे चेहरों के साथ खड़ी ताली बजाती रही। जहां कभी पुल था, अब सिर्फ खुला आसमान नजर आ रहा था।
यह पुल मुंबई की पुरानी पहचान था। 1911 में बना एलफिंस्टन ब्रिज (तब कैरॉल रोड ओवरब्रिज) प्रभादेवी और परेल स्टेशनों के बीच रेलवे ट्रैक्स को पार करता था। पूर्व और पश्चिम मुंबई को जोड़ने वाला यह पुल दशकों तक कम्यूटर्स, शेयर टैक्सी वालों और चाय की दुकानों का केंद्र रहा। चमचमाते ऑफिस भवन इसके आसपास उभरे। लेकिन शहर की बढ़ती ट्रैफिक जरूरतों ने इसे पुराना कर दिया। सितंबर 2025 में इसे हमेशा के लिए बंद कर दिया गया। अब इसकी जगह डबल डेकर ब्रिज बनेगा — निचला डेक लोकल यातायात के लिए और ऊपरी डेक सेवरी-वर्ली कनेक्टर का हिस्सा, जो कोस्टल रोड को अटल सेतु से जोड़ेगा।
रेलवे ट्रैक्स पर खड़ी सबसे बड़ी चुनौती
ब्रिज 11 लाइव रेलवे ट्रैक्स के ठीक ऊपर था। दिनभर सैकड़ों ट्रेनें गुजरती रहती थीं। गैस कटिंग और उड़ते स्पार्क्स के कारण काम सिर्फ रात के तीन घंटे के विंडो या विशेष ब्लॉक्स में ही संभव था। और बड़ी समस्या ओवरहेड इलेक्ट्रिकल (OHE) तारों की थी। दशकों में ट्रैक ऊंचा होने से तार ब्रिज से उलझ गए थे।
MRIDC के प्रोजेक्ट मैनेजर अनिरुद्ध शर्मा ने रातों की नींद गंवाकर एक अनोखा समाधान निकाला। कपड़ों की लाइन वाले विज्ञापन से प्रेरित होकर उन्होंने अस्थायी बीम तैयार किया जो गर्डर्स पर रखकर OHE तारों को ऊपर सस्पेंड रखता। वेस्टर्न रेलवे ने इसे तुरंत मंजूरी दे दी। जनवरी से काम शुरू हुआ। पैनल्स को काटकर 28 हिस्सों में बांटकर हटाया गया।
सेंट्रल रेलवे के साथ शुरू में तनाव रहा। वे अस्थायी व्यवस्था पर संदेह जता रहे थे और लंबे ब्लॉक्स की मांग कर रहे थे। 26 आधिकारिक और 40 अनौपचारिक बैठकें हुईं। 800MT क्रेन महीनों तक किराए पर खड़ी रही, जिसका खर्च करोड़ों में पहुंच गया। आखिरकार उच्च स्तर पर बातचीत के बाद काम तेज हुआ। फरवरी-मार्च में बड़े ब्लॉक्स में गर्डर्स निकाले गए।







