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HbA1c टेस्ट में खामी: दक्षिण एशियाईयों को गुमराह कर रहा डायबिटीज चेकअप

हेल्थ डेस्क, मुस्कान कुमारी।

नई दिल्ली। लैंसेट की नई स्टडी ने चेतावनी दी है कि एचबीए1सी टेस्ट लाखों भारतीयों में ब्लड शुगर लेवल को गलत दिखा सकता है, खासकर एनीमिया और ब्लड डिसऑर्डर वाले मरीजों में। इससे डायबिटीज का निदान देरी से या गलत हो सकता है, जो स्वास्थ्य जोखिम बढ़ा रहा है।

स्टडी के मुताबिक, एनीमिया, हीमोग्लोबिनोपैथी और जी6पीडी डेफिशिएंसी जैसी समस्याएं एचबीए1सी रीडिंग को तोड़-मरोड़ देती हैं। फैक्ट चेक से पुष्टि हुई कि ये निष्कर्ष लैंसेट रीजनल हेल्थ: साउथईस्ट एशिया के 9 फरवरी 2026 के ऑनलाइन संस्करण पर आधारित हैं, जहां प्रोफेसर अनूप मिश्रा की अगुवाई वाली टीम ने दक्षिण एशिया के हाई-प्रिवेलेंस क्षेत्रों का विश्लेषण किया—भारत में 50% से ज्यादा आबादी प्रभावित।

एनीमिया का जाल: निदान में चार साल की देरी का खतरा

एचबीए1सी टेस्ट हीमोग्लोबिन पर ग्लूकोज की कोटिंग मापता है, जो पिछले 2-3 महीनों का एवरेज ब्लड शुगर बताता है। नॉर्मल 5.7% से नीचे, प्रीडायबिटीज 5.7-6.4% और डायबिटीज 6.5% से ऊपर। लेकिन एनीमिया से हीमोग्लोबिन की मात्रा या स्ट्रक्चर बिगड़ने पर ये टेस्ट फेल हो जाता है। प्रो. अनूप मिश्रा, फोर्टिस सी-डॉक के चेयरमैन, ने कहा, "केवल एचबीए1सी पर भरोसा करने से डायबिटीज स्टेटस गलत क्लासिफाई हो सकता है। कुछ मरीजों का निदान देरी से होगा, तो कुछ गलत डायग्नोज—मैनेजमेंट प्रभावित।"

मुंबई के जोशी क्लिनिक के शशांक जोशी ने जोड़ा, "शहरी हॉस्पिटल्स में भी रेड ब्लड सेल वैरिएशंस और इनहेरिटेड डिसऑर्डर असर डालते हैं। ग्रामीण-ट्राइबल इलाकों में एनीमिया आम होने से गड़बड़ी और ज्यादा।" कोलकाता के डॉ. शंभू समरत समजदार ने सुझाया, "ओरल ग्लूकोज टॉलरेंस टेस्ट (ओजीटीटी), सेल्फ-मॉनिटरिंग ऑफ ब्लड ग्लूकोज (एसएमबीजी) और हेमेटोलॉजिक चेकअप्स का कॉम्बिनेशन बेहतर। इससे पब्लिक हेल्थ अस्यूमेंट्स रिफाइन होंगे।"

भारत में 50% आबादी जोखिम में, मॉनिटरिंग भी गड़बड़

भारत के कई इलाकों में आयरन डेफिशिएंसी एनीमिया से पीड़ित 50% से ज्यादा लोग (2025 डेटा) एचबीए1सी से गुमराह हो रहे हैं। जी6पीडी डेफिशिएंसी वाले पुरुषों में निदान चार साल लेट हो सकता है, जो कॉम्प्लिकेशंस बढ़ाएगा। लैब क्वालिटी कंट्रोल की कमी से भी रीडिंग्स अनिश्चित। पब्लिक सर्वे अगर सिर्फ एचबीए1सी पर आधारित, तो डायबिटीज बर्डन का गलत आकलन।

संसाधन-आधारित फ्रेमवर्क: ग्रामीण से टर्शियरी केयर तक समाधान

लेखकों ने भारत के लिए रिसोर्स-एडॉप्टेड फ्रेमवर्क सुझाया। लो-रिसोर्स सेटिंग्स में ओजीटीटी (फास्टिंग और 75 ग्राम ग्लूकोज के दो घंटे बाद) निदान के लिए, मॉनिटरिंग में एसएमबीजी (हफ्ते में 2-3 बार) प्लस बेसिक हेमेटोलॉजी (हीमोग्लोबिन, ब्लड स्मीयर)। टर्शियरी केयर में एचबीए1सी (स्टैंडर्ड इक्विपमेंट से) के साथ ओजीटीटी, मॉनिटरिंग में कंटीन्यूअस ग्लूकोज मॉनिटरिंग (सीजीएम) और फ्रक्टोसामाइन जैसे अल्टरनेटिव। जरूरत पर आयरन स्टडीज, हीमोग्लोबिन इलेक्ट्रोफोरेसिस और जी6पीडी टेस्टिंग।

फ्रेमवर्क में हेल्थकेयर रिसोर्सेस और पेशेंट रिस्क फैक्टर्स के हिसाब से मॉनिटरिंग इंटेंसिटी और बायोमार्कर्स चुनने पर जोर। एंडेमिक एनीमिया वाले क्षेत्रों (जैसे भारत) में एचबीए1सी को अन्य टेस्ट्स के साथ मिलाकर इस्तेमाल करें, ताकि गोल्ड स्टैंडर्ड टेस्ट स्प्यूरियस वैल्यू न दे।