नेशनल डेस्क, आर्या कुमारी।
नई दिल्ली, Supreme Court of India ने गुरुवार को अनिवार्य मतदान लागू करने की मांग वाली जनहित याचिका को खारिज करते हुए स्पष्ट किया कि नागरिकों को वोट डालने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता। अदालत ने कहा कि लोकतंत्र में मतदान महत्वपूर्ण जरूर है, लेकिन इसे जबरन लागू करना उचित नहीं है।
सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की ओर से दलील दी गई कि जो नागरिक मतदान नहीं करते, उन्हें सरकारी सुविधाओं से वंचित किया जाना चाहिए और उनके खिलाफ दंडात्मक कार्रवाई होनी चाहिए। इस पर अदालत ने कड़ा रुख अपनाते हुए ऐसे सुझावों को अस्वीकार्य बताया।
मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली पीठ ने टिप्पणी की कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में नागरिकों से मतदान करने की अपेक्षा की जाती है, लेकिन राज्य किसी व्यक्ति को इसके लिए मजबूर नहीं कर सकता। अदालत ने कहा कि मतदान का अधिकार व्यक्तिगत स्वतंत्रता से जुड़ा हुआ है, जिसे बाध्यकारी उपायों से नहीं छीना जा सकता।
याचिकाकर्ता के वकील ने यह भी प्रस्ताव रखा था कि अदालत Election Commission of India को अनिवार्य मतदान के लिए दिशा-निर्देश तैयार करने और बिना उचित कारण वोट न देने वालों पर प्रतिबंध लगाने हेतु एक समिति गठित करने का निर्देश दे। हालांकि, अदालत ने इस सुझाव को भी स्वीकार नहीं किया।
पीठ ने जोर देकर कहा कि मतदाताओं को जागरूक करना और उन्हें मतदान के लिए प्रेरित करना जरूरी है, लेकिन इसके लिए दबाव या दंड का सहारा नहीं लिया जा सकता। अदालत के अनुसार, जन-जागरूकता अभियान ही इस दिशा में बेहतर उपाय हैं।
अंत में, अदालत ने याचिका खारिज करते हुए कहा कि यह मामला नीतिगत निर्णयों के दायरे में आता है, जिस पर विचार करने का अधिकार संसद और सरकार के पास है। न्यायालय ने दोहराया कि मतदान एक संवैधानिक अधिकार और लोकतांत्रिक कर्तव्य है, लेकिन इसे किसी पर थोपा नहीं जा सकता।







