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इंसान ईश्वर की सबसे सुंदर व अद्भुत रचना: बिमल सर्राफ

लोकल डेस्क, ऋषि राज।

रक्सौल: मानव मन बड़ा संवेदनशील है।वह जहाँ प्रकृति के सौंदर्य को देख कर प्रसन्न हो उठता है,वहीं सांसारिक क्लेशों से विक्षुब्ध भी हो जाता है तथा सोचता है कि स्रष्टा की इस अनुपम कृति में दुःखों का प्रादुर्भाव कहाँ से हो गया ? अनेकों व्यक्ति इसका समाधान अपनी बुद्धि के अनुसार जन्म-जन्मांतरों से संबंध जोड़ते हुए प्रस्तुत करते हैं।

उक्त विचार लायंस क्लब ऑफ रक्सौल के अध्यक्ष सह मीडिया प्रभारी एवं भारत विकास परिषद् ,रक्सौल के सेवा संयोजक सह मीडिया प्रभारी सह सामाजिक कार्यकर्ता बिमल सर्राफ ने प्रेस से साझा किया। प्रचलित मान्यताएं भी यही है कि पूर्वजन्मों के संचित सुकर्म-दुष्कर्म ही बाद के जीवन में सुख_दुःख की परिस्थितियों का सृजन करते हैं।भाव_अभाव,सांसारिक सुख_दुःख एवं उपलब्धियाँ कमियों के विषय में यह तथ्य पूर्णतः सत्य है।हम ना बोलें फिर भी वो सुन लेते हैं इसलिए उनका नाम 'परमात्मा' है वो ना बोलें,फिर भी हमें सुनाई दे उसी का नाम 'श्रध्दा' है।वेसे दुनिया में सबसे तेज़ रफ्तार 'दुआओं ' की होती है,जो ज़ुबान तक पहुँचने से पहले ही 'ईश्वर' तक पहुँच जाती है।जरुरत आदमी की नहीं,आमदनी की होती है।उम्मीद संसार से नहीं,संसार को रचने वाले से करनी चाहिए।हमें बड़ों की इज़्जत इसलिए करनी चाहिए क्यूंकि उनकी अच्छाइयां हमसे ज़्यादा है और छोटो से प्यार इसलिए करना चाहिए क्यूंकि उनके गुनाह हमसे कम है।प्रार्थना ऐसे करनी चाहिए जैसे सब भगवान पर निर्भर है और प्रयास ऐसा करना चाहिए जैसे सब हम पर निर्भर है।

सफलता भी फीकी लगती है यदि कोई बधाई देने वाला नहीं हो और विफलता भी सुन्दर लगती है जब हमारे साथ कोई अपना खड़ा हो।  जीवन में सभी "वस्तुएं" एक साथ कभी नहीं मिलती,पैसे हैं तो "रिश्ते" कम है,रिश्ते हैं तो "पैसे" कम है,दोनों है तो "सेहत" कम है और अगर तीनों है तो "जीवन" कम लगता है। इंसान को उसकी बेवकूफी नहीं बल्कि जरूरत से ज्यादा उसकी चालाकी ले डूबती है।प्यार से पहले भरोसा करें। निर्णय से पहले जानकार बने,वचन से पहले वादा करें,भूलने से पहले माफ करें और पछतावे से पहले आभार प्रकट करें। फसल के लिए पहले खेतों को बीज देना पड़ता है,वैसे ही विश्व में सुख शांति के लिए पहले मन से सुख शांति का दान देना पड़ता है।"हम शब्दों को चाहे कितनी भी समझदारी से प्रयोग करें,किन्तु सुनने वाला अपनी बौद्धिक क्षमता और अपने मन के विचारों के अनुरूप ही उसका अर्थ समझता है।