लोकल डेस्क, एन के सिंह।
'दुखवा मिटाईं छठी मइया...' के गीतों से गुंजायमान हुए रक्सौल के घाट, भक्ति और शक्ति का दिखा अनूठा संगम।
मोतिहारी/रक्सौल:"कांच ही बांस के बहिनिया, बहिन लचकत जाए..." और "दुखवा मिटाईं छठी मइया, रउवे असरा हमार..." जैसे पारंपरिक गीतों की मधुर ध्वनि, अगरबत्तियों की खुशबू और छठी मइया के जयकारों से बुधवार को पूर्वी चम्पारण का वातावरण पूरी तरह शिवमय और भक्तिमय हो गया। सूर्य उपासना के चार दिवसीय महापर्व 'चैती छठ' का समापन आज उदीयमान भगवान भास्कर को अर्घ्य देने के साथ अत्यंत श्रद्धा और उल्लासपूर्ण माहौल में संपन्न हुआ।
भोर की पहली किरण और अटूट विश्वास
रक्सौल स्थित प्रसिद्ध सूर्य मंदिर छठ घाट पर आस्था का ऐसा सैलाब उमड़ा कि तिल रखने की भी जगह नहीं थी। कड़ाके की तपिश के बीच चैती छठ का कठिन व्रत करने वाले व्रती अहले सुबह से ही सूप और नैवेद्य लेकर घाटों पर पहुंचने लगे थे। जैसे ही पूरब की लालिमा ने आसमान को छुआ और भगवान सूर्य की पहली किरण जल में प्रतिबिंबित हुई, हजारों व्रतियों ने कमर भर पानी में खड़े होकर 'नमोस्तुते सूर्य' के मंत्रोच्चार के बीच दूध और जल से अर्घ्य दिया। यह दृश्य केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि प्रकृति और मनुष्य के अटूट संबंध की एक जीवंत तस्वीर पेश कर रहा था।
प्रशासन और समिति की सक्रियता से सुगम हुई राह
हजारों की भीड़ को नियंत्रित करने और पर्व को सकुशल संपन्न कराने के लिए स्थानीय प्रशासन और सूर्य मंदिर समिति ने कंधे से कंधा मिलाकर काम किया। रक्सौल पुलिस बल की तैनाती और सुरक्षा के चाक-चौबंद इंतजामों के बीच श्रद्धालुओं को किसी प्रकार की असुविधा नहीं होने दी गई।
सूर्य मंदिर समिति के सचिव शम्भु प्रसाद चौरसिया और मीडिया प्रभारी रजनीश प्रियदर्शी ने बताया कि
"श्रद्धालुओं की भारी भीड़ को देखते हुए वालंटियर्स लगातार सक्रिय रहे। साफ-सफाई से लेकर प्रकाश व्यवस्था तक, हर छोटी बात का ध्यान रखा गया ताकि मां के भक्तों को केवल अपनी साधना पर ध्यान केंद्रित करने का अवसर मिले।"
आध्यात्मिक ऊर्जा और सामाजिक समरसता
छठ केवल एक पर्व नहीं, बल्कि सामाजिक एकता का प्रतीक भी दिखा। अर्घ्य के पश्चात घाटों पर व्रतियों ने एक-दूसरे को सिंदूर लगाकर सुहाग की लंबी उम्र और सुख-समृद्धि की कामना की। ठेकुआ और फलों का प्रसाद ग्रहण करने के लिए हर वर्ग के लोग एक कतार में खड़े नजर आए। सेवादारों की टोली, जिसमें गणेश अग्रवाल, सुरेश कुमार, राजू गुप्ता, पप्पू गोस्वामी और अनिल कुमार शामिल थे, पूरी निष्ठा के साथ सेवा में जुटे रहे।
एक कठिन तपस्या का मीठा फल
चार दिनों का यह निर्जला अनुष्ठान भक्तों के चेहरों पर एक विशेष संतोष और आध्यात्मिक तेज छोड़ गया। जब व्रत पूर्ण हुआ, तो हर आंख में छठी मइया के प्रति कृतज्ञता और हर दिल में लोक कल्याण की कामना थी। इस महापर्व ने एक बार फिर यह साबित कर दिया कि श्रद्धा और विश्वास के सामने हर कठिन तपस्या सरल हो जाती है।







