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कागजों में मृत, हकीकत में जिंदा: पेंशन सिस्टम की क्रूर विफलता

स्टेट डेस्क, नीतीश कुमार।

बिहार। एक तरफ बिहार सरकार सामाजिक सुरक्षा पेंशन की राशि 400 रुपये से बढ़ाकर 1100 रुपये कर बुजुर्गों को सहारा देने का दावा कर रही है, वहीं दूसरी ओर प्रशासनिक लापरवाही और असंवेदनशील व्यवस्था के कारण जीवित लोगों को कागजों में मृत घोषित किया जा रहा है।

झाझा प्रखंड के हथिया पंचायत की बुजुर्ग अहिल्या देवी इसी अव्यवस्था की शिकार बनी हैं। उन्हें अपने जीवित होने का प्रमाण लेकर सरकारी दफ्तरों के चक्कर लगाने पड़ रहे हैं।

प्रशासनिक संवेदनहीनता का यह हाल है कि सरकारी रिकॉर्ड में अहिल्या देवी को मृत दिखा दिया गया, जिसके चलते उनकी पेंशन रोक दी गई। अहिल्या देवी का कहना है कि कई महीनों से उनके खाते में पेंशन की राशि नहीं आई।

जब उन्होंने साइबर कैफे जाकर पेंशन की स्थिति की जानकारी ली, तब उन्हें पता चला कि सरकारी सिस्टम में उन्हें मृत घोषित कर दिया गया है। यह महज तकनीकी त्रुटि नहीं, बल्कि गरीब और असहाय बुजुर्गों के प्रति प्रशासन की घोर लापरवाही और अमानवीय रवैये को दर्शाता है।

इस घटना ने विभागीय कार्यप्रणाली पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़े कर दिए हैं। यह स्पष्ट होना चाहिए कि किस आधार पर और किस कर्मचारी की रिपोर्ट पर एक जीवित महिला को मृत मान लिया गया।

बिना किसी भौतिक सत्यापन के मृत्यु दर्ज करने वाले कर्मियों की इस लापरवाही ने न केवल एक पात्र लाभार्थी को उसके अधिकार से वंचित किया है, बल्कि सरकारी योजनाओं की विश्वसनीयता को भी ठेस पहुंचाई है। अब इस पूरे मामले की उच्चस्तरीय जांच आवश्यक है, ताकि भविष्य में किसी बुजुर्ग को यह कहने की नौबत न आए - मैं जिंदा हूं।