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“गहन अध्ययन और सामाजिक संगठन से ही होगा राष्ट्र निर्माण”: मुकुल कानिटकर

लोकल डेस्क, नीतीश कुमार 

युवा शोधार्थी संवाद कार्यक्रम में राष्ट्र, समाज, इतिहास और शिक्षा पर मंथन

मोतिहारी। “राष्ट्र भक्ति प्रेरणा का गान वन्देमातरम्, राम के बनवास का गान है वन्देमातरम्, जन-जन के हर कंठ का गान हो वन्देमातरम्” की पंक्तियों और राष्ट्रभक्ति के उद्घोष के बीच महात्मा गांधी केंद्रीय विश्वविद्यालय के चाणक्य परिसर स्थित राजकुमार शुक्ल सभागार में “युवा शोधार्थी संवाद” कार्यक्रम का आयोजन किया गया।

कार्यक्रम में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सह सरकार्यवाह मुकुल कानिटकर ने राष्ट्र निर्माण, सामाजिक संगठन, इतिहास, शिक्षा और शोध की आवश्यकता पर विस्तार से विचार रखे। उन्होंने कहा कि युवाशक्ति को जिम्मेदार बनाना समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ अपने शताब्दी वर्ष में प्रवेश कर रहा है और उसका मूल उद्देश्य व्यक्ति निर्माण से राष्ट्र निर्माण करना है। उन्होंने कहा कि समाज को संगठित होने की आदत डालनी होगी। केवल शाखा ही नहीं, बल्कि मंदिर, सामाजिक कार्यों और दैनिक जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में संगठन की भावना विकसित करनी होगी।

“समाज जुड़ेगा तो राष्ट्र खड़ा होगा,” इसी विचार को आगे बढ़ाते हुए उन्होंने कहा कि मतभेद भुलाकर सामाजिक एकता मजबूत करनी होगी।

मुकुल कानिटकर जी ने कहा कि भारत 1947 में स्वतंत्र हुआ, लेकिन यह शोध का विषय है कि जब देश इससे पूर्व ही स्वतंत्र हो सकता था, तो आजादी में इतनी देर क्यों हुई।

उन्होंने कहा कि स्वतंत्रता के बाद भी “स्व” का सही अर्थ समाज नहीं समझ पाया और आज भी हमारी कई व्यवस्थाएँ अंग्रेजियत के प्रभाव में हैं।

इतिहास के संदर्भ में उन्होंने 1905 के बंग-भंग आंदोलन को सफल जनआंदोलन बताते हुए कहा कि उसके दबाव में ब्रिटिश सरकार को बंगाल विभाजन वापस लेना पड़ा।

उन्होंने कहा कि विभाजन का दर्द और राष्ट्रीय चरित्र का प्रश्न आज भी प्रासंगिक है। स्वार्थी समाज से राष्ट्रीय चरित्र का विकास संभव नहीं है।

शोध के महत्व पर बल देते हुए उन्होंने कहा कि समाज का विचार बदलना है, तो गहन अध्ययन आवश्यक है।

शोधार्थियों से मूल ग्रंथों और प्रमाणिक स्रोतों के अध्ययन का आह्वान करते हुए उन्होंने कहा कि भारतीय भाषाओं के मूल शब्द संस्कृत से जुड़े हैं और भारतीय ज्ञान परंपरा को समझने के लिए मूल स्रोतों तक जाना जरूरी है।

उन्होंने कहा कि वर्तमान अकादमिक जगत में यूरोपीय विचारों का प्रभाव अधिक दिखाई देता है।

“जिस दिन अमेरिका कहेगा कि धोती अच्छी है, उसी दिन हम उसे स्वीकार करने लगेंगे,” यह कहते हुए उन्होंने मानसिक गुलामी पर चिंता जताई। उन्होंने स्पष्ट कहा कि आत्मगौरव के बिना आत्मनिर्भरता संभव नहीं है।

राष्ट्रीय एकात्मता पर बोलते हुए उन्होंने कहा कि भारत की सांस्कृतिक शक्ति विश्व को जोड़ने की क्षमता रखती है। उन्होंने रामायण का उल्लेख करते हुए कहा कि दुनिया के कई देशों में इसे सम्मान प्राप्त है।

शिक्षा व्यवस्था पर चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि वर्तमान प्रवेश परीक्षा प्रणाली और शिक्षा ढाँचे पर पुनर्विचार की आवश्यकता है। यदि बिना परिश्रम सफलता पाने की प्रवृत्ति बढ़ेगी, तो यह राष्ट्र के भविष्य के लिए घातक होगा।

संवाद कार्यक्रम में शोधार्थियों और विद्यार्थियों ने कई प्रश्न पूछे, जिसका समुचित उत्तर मुकुल कानिटकर ने दिया। गौतम कुमार के प्रश्न का उत्तर देते हुए उन्होंने कहा कि भारतीय भाषाओं और संस्कृत की समझ भारतीय ज्ञान परंपरा को समझने में सहायक है।

अंत में उन्होंने कहा कि शोध का उद्देश्य केवल डिग्री प्राप्त करना नहीं, बल्कि समाज को दिशा देना होना चाहिए।

कार्यक्रम का धन्यवाद ज्ञापन विश्वविद्यालय के कुलानुशासक प्रो. प्रसून दत्त ने किया। कार्यक्रम में डॉ. अनुपम सिंह, डॉ. अरुण सहित कई प्राध्यापक और शोधार्थी उपस्थित रहे।