स्टेट डेस्क, मुस्कान कुमारी।
चंपारण से निकली रामभक्ति की ज्योति, स्वामी अर्जुन पुरी ब्रह्मलीन, रामभक्ति के प्रचारक ने 86 वर्ष में ली अंतिम सांस
हरिद्वार। जूना अखाड़े के वरिष्ठ महामंडलेश्वर और श्री तुलसी मानस मंदिर के संस्थापक स्वामी अर्जुन पुरी ने 86 वर्ष की उम्र में देह त्याग दी, जिससे संत समाज में शोक की लहर दौड़ गई। शनिवार देर रात करीब साढ़े 11 बजे उन्होंने अंतिम सांस ली। लंबे समय से अस्वस्थ चल रहे स्वामी अर्जुन पुरी के ब्रह्मलीन होने की खबर फैलते ही बड़ी संख्या में साधु-संत और श्रद्धालु तुलसी मानस मंदिर पहुंचे। अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष श्रीमहंत रविंद्रपुरी ने इसे अपूरणीय क्षति बताते हुए गहरा दुख जताया। महामंडलेश्वर ललितानंद गिरी, स्वामी रूपेंद्र प्रकाश, प्रबोधानंद गिरि, संजय महंत, स्वामी शिवानंद और रविदेव शास्त्री समेत कई प्रमुख संतों ने श्रद्धांजलि अर्पित की।
रामभक्ति की अनोखी विरासत
स्वामी अर्जुन पुरी श्री पंच दशनाम जूना अखाड़े के बालयोगी के रूप में विख्यात थे। उन्होंने सप्त सरोवर मार्ग पर श्री तुलसी मानस मंदिर की स्थापना की, जो हरिद्वार को रामभक्ति और सनातन चेतना का प्रमुख केंद्र बना। रामकथा के माध्यम से उन्होंने देश-विदेश में लाखों श्रद्धालुओं को सनातन धर्म से जोड़ा। उनकी वाणी में रामभक्ति, शिव आराधना और भारतीय संस्कृति के मूल्यों का गहन संदेश हमेशा समाहित रहता था।
संत समाज ने उनके योगदान को याद करते हुए कहा कि स्वामी जी ने धर्म प्रचार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। जूना अखाड़ा के प्रवक्ता महंत नारायण गिरि ने श्रद्धांजलि देते हुए बताया कि उनके जाने से संत समाज में एक बड़ा खालीपन आ गया। विभिन्न अखाड़ों के संतों ने भी सोशल मीडिया पर भावपूर्ण संदेश साझा किए, जिसमें उन्हें बालयोगी और रामभक्त के रूप में याद किया गया।
अंतिम शोभायात्रा का भव्य आयोजन
ब्रह्मलीन स्वामी अर्जुन पुरी की अंतिम शोभायात्रा रविवार सुबह निकाली गई। दोपहर में विधि-विधान के साथ भू-समाधि दी गई। उनके पार्थिव शरीर को मंदिर परिसर में अंतिम दर्शन के लिए रखा गया था, जहां हजारों श्रद्धालु पहुंचे। शोभायात्रा में जूना अखाड़ा के प्रमुख संतों के अलावा स्थानीय निवासी और रामभक्त भी शामिल हुए।
तुलसी मानस मंदिर में अंतिम दर्शन के दौरान माहौल भावुक था। श्रद्धालु रामकथा के उनके योगदान को याद कर आंसू बहा रहे थे। अखाड़ा के वरिष्ठ सदस्यों ने बताया कि स्वामी जी की समाधि मंदिर परिसर में ही दी गई, जहां अब उनके अनुयायी प्रार्थना कर सकेंगे।
बिहार से निकलकर सनातन का पुरोधा बने
स्वामी अर्जुन पुरी का जन्म पश्चिमी चंपारण के बखरिया के साधारण ब्राह्मण परिवार में विद्या पांडेय के रूप में हुआ। उनका प्रारंभिक जीवन रहस्यमय रहा, लेकिन उन्होंने युवावस्था से ही सनातन धर्म की सेवा में खुद को समर्पित कर दिया। जूना अखाड़ा में महामंडलेश्वर बनने के बाद उन्होंने कई धार्मिक आयोजनों का नेतृत्व किया। कुंभ मेलों में उनकी उपस्थिति हमेशा आकर्षण का केंद्र रही। उनके शिष्यों ने बताया कि स्वामी जी की शिक्षाएं आज भी लाखों लोगों को प्रेरित करती हैं।
10 वर्ष की बाल्य अवस्था में गृह परित्याग करने वाला बालक विद्या पांडेय, कौन जानता था कि एक दिन ये सनातन का पुरोधा बनकर न केवल भारत अपितु सम्पूर्ण विश्व को अपनी दैदीप्यमान प्रतिभा से आलोकित करेगा। आगे चलकर वही बालक विद्या पांडेय, बालयोगी, स्वामी अर्जुनपुरी जी महाराज जूना अखाड़ा के सबसे वरिष्ठ महामंडलेश्वर के रूप में विख्यात हुए। सबसे वरिष्ठ होते हुए भी इन्होंने अपने कनीय स्वामी अवधेशानन्द गिरी जी महाराज को जूना अखाड़ा के आचार्य महामंडलेश्वर के पद से सुशोभित कराया, जो इनकी त्याग का एक जीवंत उदाहरण है। आपने सनातन के अलख के साथ ही हरिद्वार की देवभूमि पर अपनी तरह का एक अलग श्री तुलसी मानस मंदिर का निर्माण कराया, जिसका वर्णन शब्दों में नहीं किया जा सकता। एक लम्बी जीवन यात्रा के पश्चात आज आप इस संसारिक लोक का परित्याग कर गोलोक वास के लिए चिर निद्रा में सदा के समाहित हो गए। आप तो चले गए पर आपका कृतित्व सदा अविस्मरणीय रहेगा।
संत समाज की एकजुट श्रद्धांजलि
जूना अखाड़ा के अलावा अन्य अखाड़ों के संतों ने भी स्वामी अर्जुन पुरी को श्रद्धांजलि दी। महामंडलेश्वर परम पूजनीय स्वामी जी को याद करते हुए कई ने उन्हें 'रामभक्ति का जीवंत प्रतीक' बताया। सोशल मीडिया पर #SwamiArjunPuri और #JunaAkhada जैसे हैशटैग ट्रेंड कर रहे हैं, जहां अनुयायी उनकी कथाओं और शिक्षाओं को साझा कर रहे हैं।
हरिद्वार में उनके ब्रह्मलीन होने से धार्मिक माहौल और गहरा हो गया है। स्थानीय प्रशासन ने शोभायात्रा के लिए सुरक्षा व्यवस्था की, ताकि श्रद्धालु बिना किसी बाधा के अंतिम दर्शन कर सकें। स्वामी जी के शिष्यों ने बताया कि उनके द्वारा स्थापित मंदिर अब उनकी स्मृति में और मजबूत होगा।
स्वामी अर्जुन पुरी ने न केवल रामकथा का प्रचार किया, बल्कि भारतीय संस्कृति के संरक्षण में भी योगदान दिया। उनके जीवन से जुड़ी कई कहानियां प्रेरणादायक हैं, जैसे कैसे उन्होंने हरिद्वार को रामभक्ति का केंद्र बनाया। उनके अनुयायी अब उनकी शिक्षाओं को आगे बढ़ाने का संकल्प ले रहे हैं।







