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चाबहार और अयनी एयरबेस पर कांग्रेस ने सरकार को घेरा

नेशनल डेस्क, श्रेया पाण्डेय 

नई दिल्ली: भारत की मध्य एशिया नीति और सामरिक हितों को लेकर देश में एक नई राजनीतिक बहस छिड़ गई है। कांग्रेस पार्टी ने ईरान स्थित रणनीतिक रूप से अत्यंत महत्वपूर्ण चाबहार बंदरगाह (Chabahar Port) और ताजिकिस्तान के अयनी (Ayni) एयरबेस को लेकर केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार पर तीखा हमला बोला है। कांग्रेस संचार विभाग के प्रभारी जयराम रमेश ने आधिकारिक बयान जारी करते हुए कहा कि चाबहार बंदरगाह का भारतीय कूटनीति के पटल से धीरे-धीरे "अदृश्य" हो जाना देश के लिए एक बहुत बड़ा रणनीतिक झटका है। उन्होंने सरकार से मांग की है कि वह इस महत्वपूर्ण परियोजना की वर्तमान स्थिति पर अपनी स्थिति स्पष्ट करे और देश को बताए कि क्या भारत इस प्रोजेक्ट से पीछे हट रहा है या इसके निवेश संबंधी सभी दायित्व पूरे हो चुके हैं।

कांग्रेस का आरोप है कि चाबहार बंदरगाह, जो पाकिस्तान के ग्वादर पोर्ट के जवाब में भारत के लिए अफगानिस्तान और मध्य एशिया का प्रवेश द्वार था, अब सरकारी प्राथमिकताओं में कहीं नजर नहीं आ रहा है। जयराम रमेश ने विशेष रूप से बजट 2026-27 का हवाला देते हुए सवाल उठाया कि इस परियोजना के लिए आवंटन में आई भारी कमी या शून्यता क्या इस बात का संकेत है कि भारत ने अपनी सबसे महत्वाकांक्षी विदेशी बुनियादी ढांचा परियोजना से हाथ खींच लिए हैं। उन्होंने तर्क दिया कि यदि निवेश के वादे पूरे नहीं किए गए हैं, तो यह भारत की क्षेत्रीय शक्ति और क्रेडिबिलिटी (साख) के लिए एक अपूरणीय क्षति होगी, क्योंकि यह प्रोजेक्ट भारत को रूस और यूरोप से जोड़ने वाले उत्तर-दक्षिण परिवहन गलियारे (INSTC) का मुख्य स्तंभ है।

इसके साथ ही, जयराम रमेश ने एक और गंभीर मुद्दा उठाते हुए कहा कि चाबहार के साथ-साथ ताजिकिस्तान स्थित अयनी वायुसेना अड्डे (Ayni Airbase) का बंद होना भारत के लिए "दूसरा रणनीतिक झटका" है। गौरतलब है कि अयनी एयरबेस मध्य एशिया में भारत का एकमात्र विदेशी सैन्य ठिकाना माना जाता था, जिसे भारत ने करोड़ों डॉलर खर्च कर उन्नत किया था। कांग्रेस का दावा है कि भारत इस महत्वपूर्ण बेस को पहले ही खो चुका है, जिससे मध्य और पश्चिम एशिया में भारत की सैन्य और रणनीतिक निगरानी क्षमताएं कमजोर हुई हैं। रमेश ने प्रधानमंत्री मोदी पर कटाक्ष करते हुए कहा कि उन्होंने डॉ. मनमोहन सिंह द्वारा शुरू की गई इस कूटनीति को केवल नया नाम देने की कोशिश की, लेकिन इसे प्रभावी ढंग से जमीन पर उतारने में विफल रहे।

हालांकि, कूटनीतिक विशेषज्ञों और सरकारी सूत्रों का कहना है कि चाबहार पर भारत का रुख अभी भी अडिग है। हाल के महीनों में भारत और ईरान के बीच बंदरगाह के संचालन को लेकर एक 10-वर्षीय दीर्घकालिक समझौते पर हस्ताक्षर हुए हैं, जो किसी भी "पीछे हटने" के दावों का खंडन करता है। विशेषज्ञों का मानना है कि बजट में आवंटन की कमी का अर्थ यह हो सकता है कि भारत ने अपने शुरुआती बुनियादी ढांचा निवेश के लक्ष्य (लगभग $120 मिलियन) को पूरा कर लिया है। फिर भी, अमेरिका द्वारा ईरान पर लगाए गए कड़े प्रतिबंधों और क्षेत्रीय युद्ध के बढ़ते खतरों ने इस परियोजना की गति को धीमा जरूर किया है, जिसे लेकर कांग्रेस ने सरकार को घेरने का कोई मौका नहीं छोड़ा है।