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जिस तने को फेंक देते थे किसान, वही बन गया लाखों की कमाई का ज़रिया

स्टेट डेस्क, आकाश अस्थाना 

केले का फल नहीं, तना बना असली सोना—खगड़िया के किसानों का कमाल, कचरा नहीं, खजाना! केले के अवशेष से बदली किसानों की किस्मत

खगड़िया जिले के बंदेहरा में 50 किसानों का नवाचार

- लोहिया स्वच्छ बिहार अभियान के तहत केले के अपशिष्ट से बनाए जा रहे आकर्षक उत्पाद
- अपशिष्ट से तैयार वस्त्रों का विदेशों तक पहुंच, हैंडीक्राफ्ट टोपी पर्यटकों की पहली पसंद


पटना, खगड़िया जिले के परबत्ता प्रखंड अंतर्गत बंदेहरा पंचायत के करीब 50 किसान अतिरिक्त आमदनी और साफ-सफाई के लिए मिसाल बन चुके हैं। यहां केले की खेती करने वाले किसान फल के साथ अब फसल के अपशिष्ट से हजारों, लाखों की कमाई कर रहे हैं। किसानों के लिए अतिरिक्त आमदनी का यह नया रास्ता लोहिया स्वच्छ बिहार अभियान (एलएसबीए) से खुला है।
बंदेहरा ग्राम पंचायत के किसान करीब 15 एकड़ कृषि भूमि में केले की खेती करते हैं। कुछ वर्ष पहले तक यह किसान फसल से फल तो निकाल लेते थे लेकिन अवशेष के निपटारे के लिए उनके पास कोई ठोस प्रबंधन नहीं था। इसकी वजह से गांव और उसके आसपास के इलाके में गंदगी पसरा रहता थी। कुछ साल पहले ग्रामीण क्षेत्रों में एलएसबीए के तहत कई योजनाएं लागू की गईं। इन्हीं में फसल के अवशेष से आकर्षक उत्पाद बनाकर बाजार में बेचने और इससे अतिरिक्त कमाई का नया रास्ता खोला गया। यह प्रयोग कचरे के निस्तारण की दिशा में आज मील का पत्थर साबित हो चुका है। इस प्रयोग से आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों के किसान भी तेजी से प्रेरित हो रहे हैं। 
 
बंदेहरा में केले की खेती करने वाले सभी किसान फसल के अवशेष से हजारों, लाखों की कमाई कर रहे हैं। प्रति तना के हिसाब से उन्हें केला किसान सहकारी समिति राशि का भुगतान कर रही है। साथ ही इस तने का प्रसंस्करण कर वस्त्र, टोकरी, बैग, मैट, कालीन, हैंडीक्राफ्ट टोपी आदि आकर्षक उत्पाद तैयार किए जा रहे हैं, जो पर्यावरण अनुकूल साबित हो रहे हैं।
 
लोहिया स्वच्छ भारत मिशन की जिला समन्वयक मीरा कुमारी बताती हैं कि केले की अपशिष्ट के इस तरीके से निस्तारण से किसानों को कई फायदे हो रहे हैं। मौजूदा समय में फसल अवशेष निस्तारण के लिए खुद के स्तर पर उन्हें कोई खर्च नहीं करना पड़ रहा है। साथ ही इस अपशिष्ट से उनकी अतिरिक्त कमाई हो रही है। उन्होंने बताया कि फसल के अपशिष्ट से तैयार उत्पाद विभिन्न स्तरों से होकर दूसरे देशों तक अपनी पहुंच बना चुके हैं।

पल्प वेस्ट से तैयार हो रहा जैविक खाद
केला किसान सहकारी समिति के निदेशक बृजेश कुमार ने बताया कि केले की फसल से रेशा निकालने के बाद बचे हुए अपशिष्ट यानी पल्प वेस्ट (कचरा) से जैविक खाद तैयार किया जा रहा है। इस खाद की बाजार में खासा मांग है। यह खाद अलग-अलग स्तरों पर पहुंचकर 50 रुपए प्रति किलोग्राम के हिसाब से बिक रहा है। उन्होंने बताया कि जैविक खाद बनाने में बंदेहरा और आसपास के क्षेत्रों से जीविका से जुड़ीं करीब 50  महिलाओं का एक समूह काम कर रहा है। यह समूह खाद बनाने के साथ करीब 80 एकड़ भूमि पर सामूहिक रूप से जैविक खेती को भी बढ़ावा दे रहा है।