लोकल डेस्क, ऋषि राज।
रक्सौल, पूर्वी चंपारण। "व्यथित मनुष्य के हृदय को वास्तविक शांति केवल परमपिता परमेश्वर ही प्रदान कर सकते हैं। इस विराट जगन्नाटक के सूत्रधार भी वही हैं और जीवन की प्रत्येक परिस्थिति उनकी ही दिव्य योजना का हिस्सा है।"
ये प्रेरणादायी विचार लायंस इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट ( 322 ई )के जोनल चेयरपर्सन सह डिस्ट्रिक्ट चेयरपर्सन सह समाजसेवी तथा भारत विकास परिषद , रक्सौल के सेवा संयोजक एवं मीडिया प्रभारी बिमल सर्राफ ने प्रेस से बातचीत के दौरान व्यक्त किए।
उन्होंने कहा कि यह संपूर्ण जीवन एक रंगमंच के समान है, जहाँ प्रत्येक व्यक्ति अपनी-अपनी भूमिका निभा रहा है। इस जीवन-नाटक में सुख और दुःख, हर्ष और विषाद, सफलता और असफलता सभी एक-दूसरे के पूरक हैं। इसलिए मनुष्य को प्रत्येक परिस्थिति को एक तटस्थ दर्शक की भाँति स्वीकार करते हुए ईश्वर द्वारा सौंपे गए दायित्व का निष्ठापूर्वक निर्वहन करते रहना चाहिए।
श्री सर्राफ ने कहा कि जिस प्रकार किसी नाटक में अभिनेता अपनी इच्छा से भूमिका का चयन नहीं करता, बल्कि निर्देशक उसके लिए भूमिका निर्धारित करता है, उसी प्रकार जीवन में भी प्रत्येक व्यक्ति की भूमिका का निर्धारण परमात्मा करते हैं। अभिनेता का कर्तव्य केवल अपने पात्र को श्रेष्ठ ढंग से निभाना होता है। इसी प्रकार मनुष्य का धर्म है कि वह अपने कर्तव्यों का ईमानदारी, धैर्य और समर्पण के साथ पालन करे। यही सच्ची साधना है और यही ईश्वर को प्रसन्न करने का सर्वोत्तम माध्यम भी है।
उन्होंने कहा कि यदि ईश्वर ने किसी को कठिन अथवा विपरीत परिस्थितियों में रखा है, तो उसे निराश होने के बजाय धैर्य और आत्मविश्वास बनाए रखना चाहिए। धैर्यवान व्यक्ति न केवल स्वयं मानसिक शांति प्राप्त करता है, बल्कि दूसरों के दुःख-दर्द को कम करने में भी सक्षम बनता है।
बिमल सर्राफ ने कहा कि अधिकांश लोग अपने ही दोषों और नकारात्मक सोच के कारण दुःखी रहते हैं। जब मनुष्य अपनी दूषित दृष्टि से दूसरों में केवल कमियाँ खोजने लगता है, तब उसके भीतर घृणा, द्वेष और क्रोध जैसी भावनाएँ जन्म लेने लगती हैं। इनका सबसे अधिक दुष्प्रभाव स्वयं उसी व्यक्ति पर पड़ता है। इसलिए दूसरों की आलोचना करने के बजाय अपने मन का आत्मनिरीक्षण करना अधिक आवश्यक है।
उन्होंने कहा कि जिस क्षण हमारे मन में किसी के प्रति द्वेष या क्रोध उत्पन्न होता है, उसी क्षण हमारी आंतरिक शांति भंग होने लगती है। अतः हमें अपने मन के विकारों को दूर करने का सतत प्रयास करना चाहिए। आत्मचिंतन, संयम, सकारात्मक सोच और सद्भावना के माध्यम से ही जीवन को सफल, सार्थक और आनंदमय बनाया जा सकता है।
अंत में श्री सर्राफ ने कहा कि प्रत्येक व्यक्ति को जीवन के इस विशाल रंगमंच पर अपने श्रेष्ठ कर्म, आदर्श चरित्र और उत्कृष्ट व्यवहार की ऐसी अमिट छाप छोड़नी चाहिए, जो समाज के लिए प्रेरणा बने। यही जीवन की वास्तविक सफलता और सच्ची सार्थकता है।







