Ad Image
Ad Image
अमेरिकी और ईरान के बीच प्रारंभिक समझौता, 60 दिन का सीजफायर लागू || अमेरिकी सेंट्रल कमान की घोषणा, ईरान की नाकेबंदी समाप्त || ईरान - अमेरिका में टकराव चरम पर, नए हमलों से सीजफायर पर लग सकता ब्रेक || जापान: तूफान जोंगमी ने मचाई तबाही, 60 हजार से अधिक घरों में बिजली गुल || जयराम रमेश ने लिखा पत्र, ग्रेट निकोबार परियोजना पर पुनर्विचार की अपील || नई दिल्ली के मालवीय नगर स्थित रेस्टोरेंट में आग से 20 की मौत, दर्जनों घायल || ट्रंप ने कहा, खाड़ी देशों की अपील पर ईरान पर हमले बंद किए गए || अदाणी समूह को अमेरिका से क्लीनचिट, आपराधिक मामलों में राहत || राहुल गांधी ने कहा, देश में बड़ा आर्थिक संकट आने वाला, आम आदमी होगा परेशान || भारत और नार्वे के बीच कुल 9 समझौतों पर हस्ताक्षर, बेहतर सहयोग की पहल: मोदी

The argument in favor of using filler text goes something like this: If you use any real content in the Consulting Process anytime you reach.

  • img
  • img
  • img
  • img
  • img
  • img

Get In Touch

पुल बना पर एप्रोच रोड गायब, एप्रोच रोड बनी तो मुख्य पुल नदारद

स्टेट डेस्क, प्रीति पायल |

बिहार के ग्रामीण इलाकों में विकास के दावों की हकीकत कुछ और ही बयां कर रही है। सरकारी योजनाओं में प्लानिंग की साफ कमी से करोड़ों रुपये के प्रोजेक्ट बेकार पड़े सड़क किनारे खड़े हैं। आज तक की ग्राउंड रिपोर्ट दो चौंकाने वाले मामलों को सामने लाई है, जो बताते हैं कि विभागीय लापरवाही और मंजूरी प्रक्रिया में गड़बड़ी से जनता को राहत नहीं मिल पा रही।

अररिया में करीब 10 साल पहले (2016 के आसपास) एक पुल बनकर तैयार हो गया। संरचना पूरी तरह मजबूत है, लेकिन पुल से जुड़ने वाली एप्रोच रोड आज तक नहीं बनी। नतीजतन, लोग पुल तक पहुंच ही नहीं पाते। यह बेकार पड़ा पुल विकास के झूठे दावों की पोल खोलता है; पैसे खर्च हो गए, लेकिन फायदा जनता को कहां?

किशनगंज का उल्टा मामला: रोड-पुलिया बनी, मुख्य पुल गुम

किशनगंज के धूम गांव में खेतों के बीच एप्रोच रोड के साथ एक छोटी पुलिया बनवा दी गई। लेकिन नदी पर प्रस्तावित मुख्य बड़ा पुल अब तक नहीं बना। इसका प्रस्ताव सरकारी स्तर पर लंबे समय से अटका है, मंजूरी नहीं मिली। जिलाधिकारी ने अब जांच के आदेश जारी किए हैं। बिना मुख्य पुल के यह सारी व्यवस्था बेकार है; लोगों की परेशानी जस की तस बनी हुई।

ये उदाहरण बिहार के गांवों में फैली ऐसी कई कहानियों का प्रतीक हैं। ठेकेदारों, विभागों और मंजूरी प्रक्रिया में लापरवाही से सवाल उठ रहे हैं—योजनाओं की प्राथमिकता कैसे तय होती है? स्थानीय लोग त्रस्त हैं और केंद्रीय जांच की मांग कर रहे हैं। विकास के नाम पर हो रही यह बर्बादी कब रुकेगी?