Ad Image
Ad Image
असम में दुर्घटनाग्रस्त सुखोई 30 के दोनों पायलट शहीद: वायु सेना प्रवक्ता || JDU की बैठक में निशांत के नाम पर लग सकती है नीतीश कुमार की मुहर || आज शाम JDU की अहम बैठक: अटकलों पर लगेगा विराम, तस्वीर होगी साफ || नीतीश कुमार ने नामांकन के बाद आज शाम 5 बजे बुलाई JDU की बैठक || कांग्रेस ने राज्यसभा चुनाव के लिए सिंघवी समेत 6 उम्मीदवारों की घोषणा की || बिहार में सियासी तूफान तेज: नीतीश कुमार जाएंगे राज्यसभा || प. एशिया युद्ध संकट से शेयर बाजारों में भारी गिरावट जारी || समस्तीपुर: दो लाख के ईनामी जाली नोट कारोबारी को NIA ने किया गिरफ्तार || AIR इंडिया आज यूरोप, अमेरिका के लिए फिर से शुरू करेगी विमान सेवा || नागपुर: SBL एनर्जी विस्फोट में 18 की मौत, 24 से ज्यादा घायल

The argument in favor of using filler text goes something like this: If you use any real content in the Consulting Process anytime you reach.

  • img
  • img
  • img
  • img
  • img
  • img

Get In Touch

पुल बना पर एप्रोच रोड गायब, एप्रोच रोड बनी तो मुख्य पुल नदारद

स्टेट डेस्क, प्रीति पायल |

बिहार के ग्रामीण इलाकों में विकास के दावों की हकीकत कुछ और ही बयां कर रही है। सरकारी योजनाओं में प्लानिंग की साफ कमी से करोड़ों रुपये के प्रोजेक्ट बेकार पड़े सड़क किनारे खड़े हैं। आज तक की ग्राउंड रिपोर्ट दो चौंकाने वाले मामलों को सामने लाई है, जो बताते हैं कि विभागीय लापरवाही और मंजूरी प्रक्रिया में गड़बड़ी से जनता को राहत नहीं मिल पा रही।

अररिया में करीब 10 साल पहले (2016 के आसपास) एक पुल बनकर तैयार हो गया। संरचना पूरी तरह मजबूत है, लेकिन पुल से जुड़ने वाली एप्रोच रोड आज तक नहीं बनी। नतीजतन, लोग पुल तक पहुंच ही नहीं पाते। यह बेकार पड़ा पुल विकास के झूठे दावों की पोल खोलता है; पैसे खर्च हो गए, लेकिन फायदा जनता को कहां?

किशनगंज का उल्टा मामला: रोड-पुलिया बनी, मुख्य पुल गुम

किशनगंज के धूम गांव में खेतों के बीच एप्रोच रोड के साथ एक छोटी पुलिया बनवा दी गई। लेकिन नदी पर प्रस्तावित मुख्य बड़ा पुल अब तक नहीं बना। इसका प्रस्ताव सरकारी स्तर पर लंबे समय से अटका है, मंजूरी नहीं मिली। जिलाधिकारी ने अब जांच के आदेश जारी किए हैं। बिना मुख्य पुल के यह सारी व्यवस्था बेकार है; लोगों की परेशानी जस की तस बनी हुई।

ये उदाहरण बिहार के गांवों में फैली ऐसी कई कहानियों का प्रतीक हैं। ठेकेदारों, विभागों और मंजूरी प्रक्रिया में लापरवाही से सवाल उठ रहे हैं—योजनाओं की प्राथमिकता कैसे तय होती है? स्थानीय लोग त्रस्त हैं और केंद्रीय जांच की मांग कर रहे हैं। विकास के नाम पर हो रही यह बर्बादी कब रुकेगी?