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फाल्टा पुनर्मतदान से पहले टीएमसी को झटका, उम्मीदवार जहांगीर खान ने नाम वापस लिया

स्टेट डेस्क, आर्या कुमारी।

कोलकाता: पश्चिम बंगाल की राजनीति में पुनर्मतदान से ठीक पहले एक बड़ा घटनाक्रम सामने आया है। फाल्टा विधानसभा क्षेत्र में होने वाले पुनर्मतदान से केवल दो दिन पहले तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के उम्मीदवार जहांगीर खान ने चुनावी मुकाबले से हटने का ऐलान कर दिया। उनके इस फैसले ने राजनीतिक गलियारों में नई बहस छेड़ दी है और आगामी चुनावी समीकरणों को लेकर अटकलें तेज हो गयी हैं।

जहांगीर खान ने मंगलवार को सार्वजनिक रूप से घोषणा करते हुए कहा कि उन्होंने क्षेत्र में शांति, स्थिरता और विकास को प्राथमिकता देते हुए चुनाव मैदान से पीछे हटने का निर्णय लिया है। उन्होंने दावा किया कि मौजूदा परिस्थितियों में जनता के व्यापक हितों को देखते हुए यह फैसला जरूरी था। उनके अनुसार, राजनीतिक प्रतिस्पर्धा से अधिक महत्वपूर्ण क्षेत्र के लोगों का विकास और सामाजिक संतुलन बनाए रखना है।

सबसे अधिक चर्चा उनके उस बयान को लेकर हो रही है जिसमें उन्होंने पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी की खुलकर सराहना की। जहांगीर खान ने कहा कि राज्य के नेतृत्व द्वारा विकास और प्रशासनिक व्यवस्था को लेकर किए जा रहे प्रयासों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। उनके इस बयान को विपक्ष और सत्तारूढ़ दल दोनों के लिए महत्वपूर्ण राजनीतिक संकेत के तौर पर देखा जा रहा है।

यह घोषणा ऐसे समय में सामने आई जब पुनर्मतदान के लिए प्रचार अभियान समाप्त होने में केवल कुछ घंटे शेष थे। चुनावी प्रक्रिया के अंतिम चरण में उम्मीदवार के पीछे हटने से स्थानीय राजनीतिक माहौल में अचानक बदलाव आया है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस फैसले का असर मतदाताओं की सोच और चुनावी परिणामों पर पड़ सकता है।

जहांगीर खान के चुनावी दौड़ से हटने के बाद अब फाल्टा विधानसभा सीट पर राजनीतिक समीकरण पूरी तरह बदलते नजर आ रहे हैं। टीएमसी के लिए इसे एक बड़े झटके के रूप में देखा जा रहा है, क्योंकि मतदान से पहले उम्मीदवार का हटना पार्टी की रणनीति और क्षेत्रीय पकड़ पर सवाल खड़े कर सकता है। वहीं, विरोधी दल इस घटनाक्रम को अपने पक्ष में राजनीतिक अवसर के रूप में देखने लगे हैं।

इस अप्रत्याशित फैसले ने पश्चिम बंगाल की राजनीति में हलचल बढ़ा दी है। पुनर्मतदान से पहले सामने आए इस घटनाक्रम के बाद अब सभी की नजरें इस बात पर टिकी हैं कि बदले हुए हालात का चुनावी नतीजों और राज्य की राजनीतिक दिशा पर क्या प्रभाव पड़ता है।