लोकल डेस्क, ऋषि राज।
रक्सौल: सराहनीय बुद्धिमत्ता वह है,जो दूरदर्शी विवेकशीलता की पक्षधर हो।जिसके साथ मानवी गरिमा के अनुरूप मर्यादाओं का परिपालन और वर्जनाओं के संदर्भ में अनुशासन का परिपालन और जुड़ा हुआ हो।
उक्त विचार लायंस क्लब ऑफ रक्सौल के अध्यक्ष सह मीडिया प्रभारी एवं भारत विकास परिषद् , रक्सौल के सेवा संयोजक सह मीडिया प्रभारी सह सामाजिक कार्यकर्ता बिमल सर्राफ ने प्रेस से साझा किया। जो इन कसौटियों पर खरी न उतरे,उस दक्षता को धूर्तता का नाम ही दिया जा सकता है।इस दृष्टि से सियारों और लोमड़ियों को भी चिरकाल से ख्याति प्राप्त है। यदि वस्तुतः मनुष्य बुद्धिमान है तो उसे क्रिया की प्रतिक्रिया से परिचित होना चाहिए।नीति और अनीति के बीच अंतर करना चाहिए और क्रिया की प्रतिक्रिया पर विश्वास करना चाहिए।वस्तुस्थिति समझने और उपलब्धियों का सदुपयोग कर सकने में भी उसे समर्थ होना चाहिए। आश्चर्य तो तब होता कि बुद्धिमत्ता का विपुल वैभव उपलब्ध होने पर भी मनुष्य अपने हित-अनाहित का सही मार्ग ढूँढ नहीं पाता,सीधी चाल चलने तक में आये दिन चूक करता रहता है। अपनी बहुमूल्य समझदारी की क्षमता और दक्षता को उन कार्यों में खर्च करता देखा जाता है,जो भ्रांतिवश लाभ जैसे प्रतीत होते हैं,पर वस्तुतः हानिकारक ही सिद्ध होते हैं।
बुद्धिमत्ता यथार्थता समझने और दूरदर्शी विवेकशीलता से जुड़ी हुई होनी चाहिए। जहाँ वह वस्तुतः होगी, वहाँ सद्विचारों को अपनाये जाना,सदाचार पर आरूढ़ होने और सद्व्यवहार के रूप में सेवा साधना के पथ पर अग्रसर होने का प्रमाण मिलना चाहिए।धर्म-धारणा का एक ही प्रमाण-परिचय है कि मनुष्य स्वयं को अपने प्रति कठोर और दूसरों के प्रति उदार बनाएं,अपने को तपाए गलाए और देव मानवों के अनुरूप दृष्टिकोण और क्रिया-कलाप का उपक्रम बनाए।जब आत्मस्वरूप का बोध हो और दिशाधारा में कायाकल्प जैसा परिवर्तन प्रस्तुत हो,तभी समझना चाहिए कि मनुष्य को बुद्धिमान समझे जाने की बात अपने सही स्वरूप में उभर रही है।







